रिपोर्ट:- संतोष चौहान, सुपौल
सुपौल :- जिले के ऐतिहासिक बीएसएस कॉलेज, सुपौल के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ० अवधेश कुमार सिंह का दिल्ली के मेरिंगो अस्पताल में इलाज के दौरान हृदय गति रुक जाने उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की खबर सुनते ही सुपौल समेत कोशी क्षेत्र का पूरा शिक्षा जगत, बुद्धजीवी सामाज एवं राजनैतिक महकमों में मौन एवं अनाथ जैसा शोक की लहर दौड़ गई। चाहे बात शिक्षा जगत की हो या सामाजिक क्षेत्र की या फिर राजनैतिक महकमे की सभी क्षेत्रों में पकड़ उनकी इतनी अच्छी थी कि इलाके के सम्मानित लोग ही नहीं बल्कि सुपौल विधानसभा से लगातार लंबे समय से विधायक एवं बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री सह बिहार के वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव भी उन्हें प्रोफेसर साहब अवधेश बाबू कहकर सम्मानित भाषा में पुकारते थे।
ज्ञात हो कि 1980 के दशक में डॉ० अवधेश कुमार सिंह जन्तु विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में सुपौल के बीएसएस कॉलेज में पदस्थापित हुए एवं जन्तु विज्ञान जैसे उलझे एवं कठिन विषय को अपने शैक्षिक एवं कौशल से बहुत ही सहज बनाया, जिसमें कॉलेज के छात्र-छात्राओं की रूची एवं झुकाव काफी बढ़ने लगा। जिससे छात्रों की संख्या में भी बढ़ोतरी होने लगा। इस प्रकार उन्होंने कॉलेज में शैक्षणिक माहौल को बहुत ही ऊंचाइयों पर ले जाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया, फलस्वरूप जिससे वे काफी चर्चित हुए।
अपने शानदार धाकड़ व्यक्तित्व एवं वाकपटुता के कारण कॉलेज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं के निवटारा में भी उन्होंने काफी निपुणता दिखाई, जिसके चलते लोग आज भी इन्हें याद करते है। उस वक्त कॉलेज में छात्र तो इनकी रौबदार मूंछें एवं भारी-भरकम शरीर के साथ भारी आवाज सुनकर ही डर जाते थे और पीछे हट जाते थे।
कॉलेज में इनकी कुशल कार्यक्षमता को देखते हुए कुछ समय के लिए इनकी पदस्थापना बी० एन० मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा में हुई, जहां निर्विवाद रहते हुए अपने शैक्षिक कौशल के बल पर पूरे कोशी क्षेत्र के शैक्षणिक जगत में छा गए। बाद में वे इग्नू से भी जुड़े एवं उपलब्धियां का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। डॉ० अवधेश कुमार सिंह सुपौल जिला खेल संघ में कोषाध्यक्ष के रूप में भी काफी चर्चित रहे। सायंस फोर सोसायटीज बिहार शाखा सुपौल के अध्यक्ष के रूप में भी इनकी सराहनीय योगदान रहा। बाल विज्ञान कांग्रेस, सुपौल में दिवंगत सायंस शिक्षक राणा प्रताप सिंह से निकटता के चलते अवधेश बाबू ने इस संस्था को भी अपना अथक योगदान देकर चार चांद लगा दिआ। जिस वजह से बच्चों में वैज्ञानिक ललक पैदा हुई और आज ऐसे बच्चे अपनी सफलता का परचम लहरा रहे हैं। इनके पढाये कुछ बच्चे तो बड़े-बड़े अधिकारी के पद पर राज्य एवं केन्द्र सरकार में अपनी कार्यक्षमता के बल पर पद को सुशोभित कर रहे हैं।
मालूम हो कि शिक्षा क्षेत्र के अलावे खासकर सुपौल के सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश में भी इनका काफी सराहनीय योगदान रहा। राजनीतिज्ञों को सही समय पर जरूरी सलाह एवं परामर्श देने से भी कभी नहीं चूके। समाज में सामाजिक समस्याओं के हल के लिए भी उन्होंने काफी सक्रिय रूप से अपना निस्स्वार्थ योगदान दिए। जिसका परिणाम स्वरूप राजनीति से जुड़े लोग एवं समाज से जुड़े हुए लोग आज भी उन्हें याद करते हैं।
ज्ञात हो कि डॉ० अवधेश कुमार सिंह सुपौल के पुराने जिला सहरसा के सरडीहा गांव के निवासी थे। लेकिन कार्यक्षेत्र सुपौल रहने एवं यहां की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत होने की वजह से अपनी सेवानिवृत्त के बाद भी वे बहुत दिनों तक सुपौल में ही बने रहे। काफी समय बाद उन्होंने सुपौल में भाड़े के घर को छोड़कर पैतृक गांव सरडीहा चले गए और वही रहने लगे। कभी कभार सुपौल आते-जाते रहते थे। इस दौरान लगभग पांच वर्ष पूर्व गांव में ही उनकी पत्नी नन्दा सिंह भी गुजर गई। पत्नी के गुजरने के बाद से अबधेश बाबू थोड़ा चिंतित रहने लगे। हालांकि कभी-कभी अपनी पुत्री अमृता सिंह के पास पटना एवं पुत्र अमित आनंद के पास दिल्ली भी जाते-आते रहते थे। अब वे दुनिया को ही छोड़ चले गये। उनकी याद खासकर सुपौल में सदा जीवित रहेगी। लोगों ने कहा कि अवधेश बाबू का व्यक्तित्व और कृतित्व हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। उनके निधन पर कई संस्था के सदस्यों, शिक्षाविदों और समाजसेवियों ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। लोगों ने कहा कि अवधेश बाबू का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। जिसे भूलाया नहीं जा सकता।



