:- रवि शंकर अमित!
इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम ऐसे अंकित होते हैं जो किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक विचार, एक संकल्प और एक समूचे युग की गाथा कहते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही युगपुरुष थे। उनकी 125वीं जयंती किसी महान नेता का स्मरण मात्र नहीं, बल्कि भारत की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उस ध्येय का पुनःस्मरण है, जिसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी देश के मूर्धन्य शिक्षाविद् और न्यायविद् थे। बाल्यकाल से ही उनमें असाधारण प्रतिभा, राष्ट्रभक्ति और नेतृत्व की चमक दिखाई देने लगी थी। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान रचते हुए वे मात्र 33 वर्ष की आयु में कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने — एक उपलब्धि जो आज भी भारतीय शिक्षा जगत में अनुपम मानी जाती है।
किंतु उनका जीवन बौद्धिक उपलब्धियों तक सीमित न रहा। उन्होंने राष्ट्र की चुनौतियों को निकट से देखा और राजनीति को सत्ता का नहीं, सेवा का माध्यम बनाया। जब देश विभाजन की त्रासदी झेल रहा था, तब उन्होंने बंगाल के लाखों हिंदुओं के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए निर्णायक संघर्ष किया। यदि उस घड़ी डॉ. मुखर्जी ने यह दृढ़ता न दिखाई होती, तो आज पश्चिम बंगाल का बड़ा भूभाग भारत का अंग न होता। पंजाब के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने में भी उनकी भूमिका अविस्मरणीय रही।
स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए। परंतु जैसे ही उन्हें अनुभव हुआ कि कुछ नीतियाँ राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा के अनुकूल नहीं हैं, उन्होंने सत्ता का मोह त्यागकर त्यागपत्र दे दिया। यह निर्णय बताता है कि उनके लिए पद नहीं, सिद्धांत सर्वोपरि थे।
डॉ. मुखर्जी मानते थे कि भारत को ऐसी राजनीतिक शक्ति चाहिए जो राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता और जनकल्याण को अपने केंद्र में रखे। इसी संकल्प के साथ उन्होंने 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यह केवल एक दल का जन्म नहीं था, बल्कि राष्ट्रवादी राजनीति के एक नए अध्याय का शुभारंभ था। जनसंघ के माध्यम से उन्होंने देश की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को सशक्त करने का बीड़ा उठाया।
आज भारतीय जनता पार्टी जिस विराट स्वरूप में देश-दुनिया के समक्ष खड़ी है, उसकी वैचारिक नींव डॉ. मुखर्जी ने ही रखी थी। “राष्ट्र प्रथम, संगठन सर्वोपरि” का जो मंत्र आज भाजपा की पहचान है, उसके मूल में उन्हीं का चिंतन और दृष्टि विद्यमान है।
उनका सर्वाधिक ऐतिहासिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण को लेकर था। स्वतंत्रता के बाद वहाँ लागू विशेष व्यवस्था उन्हें कभी स्वीकार्य न रही। उनका स्पष्ट उद्घोष था कि भारत एक राष्ट्र है, और एक राष्ट्र में दो संविधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चल सकते। इस व्यवस्था के विरुद्ध उन्होंने देशव्यापी जनजागरण किया और स्वयं जम्मू-कश्मीर जाने का साहसिक निर्णय लिया।
11 मई 1953 को वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, और 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनका यह बलिदान राष्ट्र की अखंडता के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदानों में गिना जाता है। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रहित के लिए संघर्ष करने वाला व्यक्ति पराजित नहीं होता — वह इतिहास में अमर हो जाता है।
डॉ. मुखर्जी का स्वप्न था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बने। यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए को समाप्त कर उनके इस स्वप्न को साकार किया। यह केवल एक संवैधानिक निर्णय नहीं, बल्कि उनके बलिदान को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि भी थी।
डॉ. मुखर्जी सामाजिक समरसता और वंचित वर्गों के उत्थान के प्रबल पक्षधर थे। उनका विश्वास था कि भारत का विकास तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। आज “अंत्योदय” तथा “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के मंत्र में उन्हीं की विचारधारा आगे बढ़ती दिखाई देती है।
उनकी राजनीति सत्ता प्राप्ति की नहीं, राष्ट्र-निर्माण की राजनीति थी। वे भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र मानते थे — जिसकी आत्मा उसकी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं में बसती है। यही कारण है कि भारतीयता की रक्षा और राष्ट्रीय एकता को उन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बनाया।
उनका जीवन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। उनका संघर्ष सिखाता है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण, सिद्धांतों के प्रति निष्ठा और विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने का साहस ही सच्चे नेतृत्व की कसौटी है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, उनके विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
उनकी 125वीं जयंती पर हम सब उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। आइए संकल्प लें कि भारत की एकता, अखंडता, सांस्कृतिक गौरव और गरीब कल्याण के लिए उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए विकसित भारत के निर्माण में अपना योगदान देंगे। राष्ट्र की एकता के लिए जीवन अर्पित करने वाले इस महानायक के प्रति यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” — यह उद्घोष आज भी करोड़ों देशवासियों को राष्ट्रहित में समर्पित होने की प्रेरणा देता है।
संजय सरावगी
प्रदेश अध्यक्ष,भारतीय जनता पार्टी, बिहार



