प्रस्तुति – अनमोल कुमार
“या देवी भूता रूपेण, क्षुधा तृष्णा कलहात्मिका।
धूमवत्यै नमस्तुभ्यं, कालरात्रि स्वरूपिणि॥”
माँ धूमावती महाविद्याओं में वह स्वरूप हैं जो तंत्रमार्ग के रहस्य, भय, त्याग और वैराग्य का शिखर हैं। वे मात्र अभिचार कर्म की अधिष्ठात्री नहीं, अपितु गूढ़ ब्रह्मविद्या की द्वारपालिका हैं। उनका स्वरूप विकराल है, उनकी मूर्ति भयावह — परंतु साधक के लिए यह सब माया मात्र है, भ्रम है, जिसका उद्दीपन ही तांत्रिक साधना का आरंभ है।
नाम का रहस्य:
शास्त्रीय आख्यान कहता है कि एक बार माता पार्वती ने अत्यधिक क्षुधा से शिव को ही निगल लिया। शिव माया रूप धारण कर धूम में परिणत हो गए और बाहर निकल आए। यह धूमरूप ही कालांतर में ‘धूमावती’ के रूप में विख्यात हुआ। इसका अर्थ यह है कि —
“जब स्वयं शिव भी शक्ति में लीन हो जाते हैं, तब वह शक्ति धूमावती कहलाती है।”
स्वरूप और भाव :
विधवा स्वरूप, विरूप शरीर, शुष्क, मेले वस्त्र, बिखरे केश, लटकते स्तन, चंचल नेत्र, काँपते हाथ, हाथ में सूप और वर मुद्रा, और रथ पर कौवे की पताका — यह सब रूप अलौकिक गूढ़ता और वैराग्य का संकेत है। यह भयंकरता अविद्या का नाश करने वाली है, न कि भय उत्पन्न करने वाली।
वे कलहप्रिया, क्रोधात्मिका, क्षुधारूपा और तृष्णामयी हैं — क्योंकि वे ही हैं जो माया की सभी सीमाओं को पार करके साधक को परम में प्रविष्ट कराती हैं।
अभिचार कर्म में उपयोग:
धूमावती साधना में अभिचार तंत्र (शत्रुनाश, उच्चाटन, मारण, मोहन आदि) का विशेष महत्व है, किन्तु यह केवल एक पक्ष है।
शास्त्रों में अनेक प्रकार के प्रयोग वर्णित हैं — जैसे:
शत्रु का नाम लिखकर शिवलिंग स्थापित कर जप करना।
अमावस्या की रात्रि में एकांत या श्मशान में मौनपूर्वक जप।
कौए की अस्थि की भस्म का अभिमंत्रण और प्रयोग।
हल्दी पत्र पर शत्रु का नाम लिखकर वन में गाड़कर जप करना।
किन्तु ये सभी प्रयोग गुरु दीक्षा और पूर्ण आचरण-संयम के बिना वर्ज्य हैं। क्योंकि इस मार्ग में त्रुटि करना आत्मघात है।
गोपनीयता और संयम का आदर्श:
धूमावती साधना में साधक को चाहिए कि वह एकांतवास, मौन, वैराग्य और आत्मिक पवित्रता बनाए रखे। किसी को अपना चेहरा भी न दिखाए, क्योंकि यह साधना ‘अहं’ के पूर्ण विसर्जन की साधना है।
विशेष तथ्य:
धूमावती को ज्येष्ठालक्ष्मी भी कहा गया है — अर्थात् वे वैराग्य की संपदा हैं।
उनके वाहन प्रेत हैं — अतः साधक को निर्भीक और दृढ़चित्त होना आवश्यक है।
साधना में सफेद वस्त्र, सफेद आसन, मोती की माला ही प्रयोग में लानी चाहिए।
जो काले वस्त्र या काली हकीक की माला बताते हैं, वे तांत्रिक परंपरा से अनभिज्ञ हैं।
धूमावती : केवल अभिचार नहीं, अपितु निवारण भी:
माँ धूमावती के कुछ मंत्र और स्तोत्र ऐसे भी हैं, जो अभिचार के दोषों को नष्ट करते हैं। वे विनाश की अधिष्ठात्री ही नहीं, रक्षण की भी पराकाष्ठा हैं।
वे वह शक्ति हैं जो स्वयं कहती हैं — “जो मुझे युद्ध में जीत ले, वही मुझसे विवाह कर सकता है।”
अब तक कोई उन्हें जीत न सका, इसलिए वे नित्यकुमारी हैं — यह विधवावेश भी एक गूढ़ प्रतीक मात्र है, न कि सामाजिक स्थिति।
॥ माँ धूमावती की साधना — साधक का अंतःविलय ॥
॥ जो भय से पार गया, वही ब्रह्म में प्रविष्ट हुआ ॥
॥ जय धूमावती महाविद्या॥
॥जय आदिशक्ति परात्पर रूपा परमेश्वरी॥
– आचार्य पं० शुभ दर्शन
ज्योतिषाचार्य • तन्त्राचार्य
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(BHU),वाराणसी
9801630444




