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गौमूत्र कल्प से कैसे होता है काया कल्प, आइये जानते हैँ!

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प्रस्तुति – अनमोल कुमार

गोमूत्र कल्प के प्रारम्भ में मरीज के अंदर जमा मल जो पेट में लगातार चिपक कर मोटी परत के रुप में एकत्रित हो जाता है तथा समय बीतने
पर बहुत ही काला हो जाता है। गोमूत्र मल की पेट में जमा मोटी परत को धीमे धीमे ढीला करने लगता है।
कब्ज के मरीज के पेट में से गाढ़ा काले रंग का मल कई दिनों तक निकलने लगता है। गाढ़ा काला मल निकलना उपचार की १०० प्रति’शत सफलता है। अंदर की गंदगी पूरी तरह से निकलने पर बड़ी आंत की पूरी तरह से सफाई होती है। बड़ी आंत के कैंसर में सुधार भी दिखाई देने लगता है। १८० दिनों तक कल्प करने पर बड़ी आंत की सफाई होने पर बड़ी आंत पूरी तरह से नयी हो जाती है।
यकृत, फेफड़े, ह्रदय सभी नये और बल’शाली बन जाते हैं। मरीज को गाढ़े काले रंग के मल से घबराना नहीं चाहिये। जब काला मल पूरी तरह से
निकल जाता है तब पाचन सही होने के कारण जठर अग्नि पूरी तरह से जाग्रत होने के कारण मरीज को बहुत तेज भूख लगने लगती है। तेज भूख लगना कब्ज ठीक होने के लक्षण हैं। गोवंश से गोमूत्र १२ माह मिलता है गोमूत्र से कब्ज के मरीजों के लिये दवायें भी तैयार की जा रही हैं। कब्ज के मरीज दवायें ज्यादा पसंद कर रहे हैं। आयुर्वेद की कंपनिया गोमूत्र से ही दवायें तैयार करती हैं। लेकिन बहुत मंहगी होने के कारण गरीब व्यक्ति के लिये उचित नहीं हैं। आप भी दवा तैयार कर उपयोग अव’शय करें गोमूत्र, छोटी हरड ५०० मिलीग्राम, जयपाल ५० मिलीग्राम, चित्रक १०० मिलीग्राम जीर्ण विबंध को दूर करने के लिये उपयोगी है।
कल्प के समय गोमूत्र की मात्रा
शरीर के आकार और वजन के अनुसार गोमूत्र थूक की लार में अच्छी तरह से मिलाने के लिये चूस चूस कर पीना चाहिये। गौ मूत्र जल्दी जल्दी नहीं पीना चाहिये।
१ गिलास गौमूत्र पीने के लिये ५ मिनट का समय लगना चाहिये ६ फुट की लम्बाई के व्यक्ति को सिर्फ ६ लीटर मूत्र आवश्यक रुप से पीना है। मूत्र कल्प के प्रारम्भ में भूल से भी गौ मूत्र की बहुत ही अधिक मात्रा नहीं ग्रहण करनी चाहिये। मूत्र कल्प करने के प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा प्रत्येक बार बहुत ही कम रहती है तथा दिन भर में कम बार गौ मूत्र ग्रहण करना है। समय के साथ साथ धीमे धीमे मूत्र की मात्रा और दिन भर में मूत्र लेने की अवधि भी शरीर की आवश्यकता के अनुसार बढानी आवश्यक है। आव’शयकता के अनुसार यदि गौ मूत्र की मात्रा मरीज को नहीं मिलती है तो मरीज को कमजोरी आ जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा में गौ मूत्र कल्प करने के पहले दिन २५ मिली लीटर हर २ घंटे बाद ७ बार, दूसरे दिन ५० मिली लीटर, तीसरे दिन ७५ मिली लीटर, चौथे दिन १०० मिली लीटर, पांचवे दिन १२५ मिली लीटर, छटे दिन १५० मिली लीटर, सातवे दिन १५० मिली लीटर हर ढेड घंटे में ९ बार, आठवे दिन १७५ मिली लीटर, नौवें दिन २०० मिली लीटर, दसवे दिन २०० मिली लीटर, ग्यारवे दिन २०० मिली लीटर १२ बार हर १ घंटे में, बारहवे दिन २५० मिली लीटर, तेरहवे दिन ३०० मिली लीटर, चौहदवे, पंदरवे,सोलहवे दिन ३०० मिली लीटर १६ बार हर ४५ मिनट में पीना अनिवार्य है। सत्रहवे दिन से मात्रा और भी बढायी जा सकती है तथा अधिक बार मूत्र पीया जा सकता है। गोमूत्र कल्प से हर प्रकार के कैंसर से लड़ा जा सकता है। और स्वस्थ बना जा सकता है। गोमूत्र कल्प के बारे में विस्तार से जानकारी के लिए गौ भक्त सहदेव जी भाटिया द्वारा लिखित गोमूत्र कल्प पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता है। आप द्वारा यूट्यूब चैनल से भी जुड़े। जय गौ माता जय गोपाल अखिल विश्व कामधेनु सेवक ज्योतिषाचार्य अंकित रावल सिरोही राजस्थान।।

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