प्रशान्त कुमार की रिपोर्ट

चेरियाबरियारपुर भगवती बिषहरी के प्राचीन मनोकामना मंदिर कुंभी में नागपंचमी के दिन श्रद्धालुओ का तांता सुबह से ही प्रारंभ हो जाती है. इसकी सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है. बताया जाता है यहां प्रत्येक वर्ष बलिदानियों की लंबी तदाद देखने को मिलती है. पूजा समिति के शिवशंकर यादव, रामचरित्र महतो, गणेश महतो, जयप्रकाश यादव, रामबिलाश सहनी, संतोष पासवान, अशोक कुमार महतो, उमेश शर्मा आदि बताते हैं इस मंदिर का लगभग दो सौ वर्ष से अधिक पूर्व का इतिहास है. सहरसा के सप्तदवारी में भगवती की भव्य मंदिर है. जहां पर सातनपुर के एक शर्मा जी माता का भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करते थे. जब शर्मा जी घर से निकलने लगे. तो माता से सत करवाकर साथ चलने के लिए निवेदन किया. माता ने वचन दिया कि रात्रि में अगर रास्ते में जहां रख दोगे मैं वहीं रह जाऊंगी. शर्मा जी जब कुंभी पहुंचे तो बहुत रात हो गई. और वे शिवदयाल यादव के घर पर रुक गए. सुबह में शर्मा जी चलने लगे तो माता शर्त के अनुसार कुंभी में ही रह गई. और भायलाल भगत के शरीर में प्रवेश कर अपना रुप प्रकट कीं. तब शिवदयाल यादव ने माता से सत करवाया कि पूरे गांव के लोग बहियार में रात भर रहते हैं. माता मेरे गांव के लोग सांप-बिच्छू के डंक से बचे रहें. माता ने बचन दिया और आज भी इस गांव में सांप-बिच्छू के डंक से किसी के साथ अनहोनी नहीं हुई है. तब गांव में ही माता का मंदिर बनाकर स्थापित किया गया. तब से जान के बदले बकरे की बलि देने का सिलसिला अनवरत जारी है. भगवती बिषहरी की विशेष कृपा इस गांव पर है. यहां के लोग प्रदेश मे रहने पर भी सांप के डंसने पर मंदिर कि दिशा मे मुख कर भगवती के स्मरण मात्र से ठीक हो जाते हैं. ग्रामीणों की मानें तो भगवती की पूजा के सात दिन पहले डीहबार बाबा का पूजा होता है. फिर एक दिन पहले माता का जागरण कर वैदिक रीति से पूजा की जाती है. इस मंदिर पर बगल के कई गांवों के लोगों की श्रद्धा बसती है. तथा मनोकामना पूर्ण होने पर नागपंचमी के दिन गछौती उतारते हैं. प्रत्येक वर्ष मंदिर प्रांगण में दो हजार से अधिक बकरे की बलि पड़ती है.




