राम जी जब आप में प्राण प्रतिष्ठित हो ही गये हैं तो आप अपने भव्य मंदिर में ही
विराजित नहीं रहना!

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:- अनमोल कुमार!

।। विनती राम से ।।

राम जी
जब आप में प्राण प्रतिष्ठित हो ही गये हैं तोआप अपने भव्य मंदिर में ही_
विराजित नहीं रहना

निकलना कभी देशाटन पर
गांवों कस्बों की गलियों में जाना
देखना वहां के सुख दुःख
देखना झोपड़ियों में लगी अपनी फोटुएं
जिन पर निष्ठा से
लोग अगरबत्तियां लगाते हैं

रामलला
आप तो पले हैं करोड़ों लोगों के भाव में
उनके मन में
अब आप उन ललाओं से भी मिलना
जो पल रहे भूख और अभाव में
उनके पैरों को भी
अपनी जैसी पैजनिया देना
ताकि जब वह ‘ठुमक चलें’ तो बाजे वह,
जैसी आपकी बजती हैं

रामजी जाना,
एक चक्कर मणिपुर का लगा आना
जहां स्त्रियों की आत्माएं
निर्वस्त्र की गई थीं
वे कब से प्रतीक्षा कर रहीं हैं
अपने पर हुए अत्याचार के प्रतिकार का

और हां
आप तो पूरी दुनिया के हैं रामजी
तो हो सके कभी
गाज़ा पट्टी की ओर भी जाना
वहां सहमे डरे बच्चों को गले लगाना

लौटते में
जेरुसलम ओर मक्का होते हुए आना
मिलना वहां ईसा मसीह
और पैगम्बर साहब से भी

प्रभु कभी समभाव दिखाते
पास पड़ोस की मस्जिद
गुरुद्वारे, गिरजाघर में भी चले जाना
उस ‘मसीत’ में तो जरूर जाना
जहां तुलसीदास मांगकर खाने के बाद सोते थे *

रामजी
तंबू से महल तक तो पहुंच गये आप
पर चौबीसों घण्टे वहीं
अपने वैभव में नहीं रहना
निकलना
अपने स्वर्णजड़ित दरवाजे से
कभी उन वनवासियों के पास भी जाना
जिन के साथ तुमने
रावण की लंका ढहाई थी
वे वनवासी ना लंका में रह पाए थे
ना तुम्हारे साथ अयोध्या में आये थे
रह गये थे वहीं
दंडक और विंध्य के उन्हीं वनों में

विनती है
जाना जहां भी, सजीव होकर जाना
पंडे पुजारियों के कंधों पर
मूरत के रूप में नहीं जाना

रामजी

कभी फुरसत हो
तो विचार करना कि
तुम्हारा यह भव्य निवास
अहंकारी राजाओं ने
अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए तो नहीं बनवाया
और तुम में प्राण फूंकने का उनका मक़सद क्या था

हे राम
यदि सचमुच आप में
प्राण प्रतिष्ठा हो गई है
तो बापू के हत्यारों को यह जरुर बताना
कि उनकी हत्या
तुम्हें अच्छी नहीं लगी थी
और उनके साथ
तुम्हारी भी हत्या हो गई थी
_बस इतनी सी तो विनती है

_जय सियाराम

माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो,
_लैबो को एकु, न दैबे को दोऊ
●तुलसीदास जी

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