रवि शंकर शर्मा –
२१ सितंबर १९९५ का वो दिन जब ये ख़बर आग की तरह ना सिर्फ़ भारत बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई , की गणेश जी मूर्ति दूध पी रही है , ये ख़बर अख़बारों जैसे ही सुर्ख़ियाँ बनी की भगवान श्रीगणेश जी के मंदिरों के सामने लंबी लंबी क़तारें लगनी शुरू हो गई , बाज़ार में दूध की कमी हो गई , ख़बर जब राजनीतिक गलियारेमें फैली तो कहा ये भी गया की अटल जी ने भी दूध पिलाया , ऐसे ही तमाम नेताओ और विशिष्ट व्यक्तियों की तस्वीरें सामने आने लगी जो भगवान गणेश को दूध पिलाने के लिए मंदिरों में पहुँचने लगे।
जब राजनीतिक व्यक्तियों की ऐसी तस्वीरें सामने आई तो इन तस्वीरों ने वैज्ञानिकों का ध्यान भी आकर्षित किया ।

वैज्ञानिकों द्वारा इसे पृष्ठ तनाव यानी सर्फेस टेंशन का नाम दिया गया, जो किसी भी आस्तिक सनातनी के गले नहीं उतरी, क्योंकि जो मूर्तियाँ विभिन्न धातुओं, पत्थरों और मिट्टी से बनी थी वो सभी पूरी दुनियाँ में दूध पी रही थी । ये किसी विशेष धातु से बनी मूर्ति की बात नहीं थी

ऐसी ही एक घटना आज मोकामा के हाथीदह में देखने को मिली जहां भगवान शिव के नंदी जल पीते नजर आये , मीडिया कर्मियों ने इसे विभिन्न क़िस्म से परखा पर प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती, वाक़ई नंदी जल ग्रहण कर रहे थे , ऐसा लग रहा था मानो सिरिंज से कोई जल को खींच रहा हो और देखते ही देखते वर्तन ख़ाली हो जा रहा था ,
विज्ञान के पास तब भी इसका जवाब नहीं था और भी तलाश जारी है

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कहते हैं आस्था के आगे कोई तर्क भी चलता । शायद ऐसा ही कुछ है , लोग पवित्र सावन मास में नंदी को जल पिलाकर ख़ुद को धन्य समझ रहें हैं ।
1995 के बाद भी ऐसी घटनाएँ कई बार हुई, विज्ञान इसे पृष्ठ तनाव का नाम डेटा आ रहा है और आस्थावान चमत्कार का!

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