बदलते पत्रकारिता के दौड़ में पीछे छूट रहे आचरण!

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दादा ठाकुर!

पत्रकारिता का एक दौर हुआ करता था! जब साइकिल से पूरा शहर को खंगाल दिया जाता था! बस पता चले समाचार मिलने वाली है! दरअसल पहले के पत्रकार साइकिल से चला करते थे खर्च भी महज ना के बराबर! दरअसल झंडा बदर हुआ करते थे लेकिन आज क पत्रकारिता की ट्रेड बदला झंडा बदर से हटकर वामपंथी और दक्षिणपंथी भजन ने रूप ले लिया! कई ऐसे पत्रकार आपको मैदान में मिल जाएंगे जिन्हें पत्रकारिता की एबीसीडी तक मालूम नहीं एक्सपीरियंस के नाम पर 25 साल! दरअसल भूले भटके मैं किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंच गया! और गिफ्ट के नाम पर पत्रकारों की संख्या देखकर हैरान रह गया! खैर जेहन में इतनी तो बात जरूर आ गई! अब पत्रकारिता का दौर झंडा बदल नहीं वामपंथी-दक्षिणपंथी भजन हो गया!

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