बिहार में विकास के 30 साल का इतिहास और उसका लेखा-जोखा।

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शंकर दयाल मिश्रा के साथ पंकज कुमार ठाकुर राजनीति विश्लेषक

अभी 2022 है। 2005 से 2020तक15 साल का नीतीश कुमार ने सफर तय किया फिर बिहार चुनाव हुआ चेहरा नीतीश कुमार ही रहे। और बरकरार रहे।
क्योंकि बात उठी है 30 साल में बिहार का विकास नहीं हुआ। इसीलिए काफी मंथन करने के बाद कई राजनीतिक विश्लेषकों से राय लेने के बाद। हमने लिखने की कोशिश की है। और हमें विश्वास है आपका प्यार हमें जरूर मिलेगा!

कार्यकारी संपादक आपका अपना पंकज कुमार ठाकुर

15 साल बुरा हाल… सरकार बदलो बिहार बदलेगा… नया बिहार नीतीश कुमार !

कुछ याद आया ? आइये 17साल पीछे चलते हैं। तब इन्ही नारों के साथ बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव का श्री गणेश किया था। तब बिहार में सरकार के परिवर्तन का एक वातावरण बना। इस जनभावना के घोड़े पर चढ़कर एक साल में फरवरी से नवम्बर के बीच नीतीश कुमार ने लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन का खात्मा किया था।
अभी 2022है। 2005 से2020 तक 15 साल का सफर पूरा कर परिस्थियों का तकाजा ने मुख्यमंत्री एक बार फिर नीतीश कुमार को बना दिया।

तो ऐसे में हम आपके लिए हमने आपका अपना शंखनाद मीडिया हाउस विभिन्न प्लेटफार्म पर मैं लगातार बिहार के चुनावों का 30 साल का इतिहास और उसका हिसाब-किताब लेकर आया हूं। वर्तमान राजनीतिक गतिविधियों की भी सटीक जानकारी देंगे। इसका विश्लेषण करेंगे। विभिन्न चुनावों में राजनीतिक जोड़-तोड़ का हिसाब करेंगे। 1980 से 90 के बीच कई मुख्यमंत्री देने बाले बिहार में इसके बाद के 30 वर्षों में चार मुख्यमंत्रियों का लेखा-जोखा, इन सबके बीच बिहार की जनता ने क्या खोया क्या, पाया सब !
आइये अब हम भूमिका से निकलते हैं। एक ऐसी पटकथा की शुरुआत करते हैं जो जादुई है, तिलिस्मि है। यह एक साधारण परिवार के बालक और उसके लालू प्रसाद बनने की कहानी है। इसे अगर समकालीन राजनीति ने देखा नही होता तो किसी को यकीन करना भी मुश्किल था।
8 मार्च १९९० ! बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम आ चुका था। राष्ट्रीय मोर्चा सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन बन सामने आया था। जनता दल को 122 सीटें और वाम मोर्चा को 39 सीटें मिली। सरकार बनने के लिए जनता दल को शिबू सोरेन को साधना था। उनके समर्थन के बिन यहाँ रामो–बामो एक मजबूत सरकार नहीं दे सकती थी। कांग्रेस 72 सीटों के साथ हार चुकी थी। जनता दल को भाजपा भी बाहर से समर्थन के लिए तैयार थी। लेकिन, सवाल था नेतृत्व का। जनता परिवार का इतिहास बहुत ही अविश्वसनीय था। ऊपर से रामसुंदर दास, रमई राम, गुलाम सरवर, रामविलास पासवान, जार्ज फर्नांडीस, शहाबुद्दीन आदि के बीच सबको साथ लेकर चलने वाले चेहरे की तलाश थी। मैं नहीं तो तुम भी नहीं का कुचक्र चल रहा था। ऐसे में मध्यप्रदेश के नेता शरद यादव को बिहार पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है। गंगा, कोशी, महानंदा, गंडक इत्यादि नदियों के महामंथन के बाद दुनिया को एक चेहरे का परिचय मिलता है। लालू प्रसाद यादव! गंवई बिहार का चेहरा। एक नाम, जिसे मुहर लगाते हुए शरद यादव ने सोचा भी नहीं होगा कि यह निर्णय भारतीय राजनीति के हर गणित को पलटने बाला है। सच कहें तो शरद यादव के द्वारा इस निर्णय के वक्त शायद मां शारदे उनके मन में आ गयी थी…।
कहानी जारी रहेगी…कल…

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