कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर
एक तर्क यह भी आया कि जांच बढ़ा दी गई है तो स्वभाविक है…। बीच में जांच कम हुई थी, केस कम हो गए…। लोग ढीले पड़ गए। तालाबंदी से बेपटरी हुई दुनिया फिर से पटरी पर लौटने लगी। लेकिन अभी फिर से कोरोना-कोरोना…। शुरू में लोगों ने उपेक्षा की पर अब खौफ इस कदर बढ़/बढ़ाया जा चुका है कि टेस्ट कराने वालों की स्वत: भीड़ बढ़ गई है। भागलपुर के जांच केंद्रों में मिल रही रिपोर्ट पर गौर करें तो किसी-किसी केंद्र पर 45 प्रतिशत तक लोग पॉजिटिव मिल रहे हैं। यानी कि कह सकते हैं कि इस बार पॉजिटिविटी रेट पिछले बार से काफी अधिक है। तो सवाल यह भी कि क्या पिछले वर्ष बिहार में चुनाव के कारण कोरोना बड़े स्तर पर यहां से छुट्टी लेकर कहीं चला गया था या डाटा मैनिपुलेट किया गया था।
वैक्सीनेशन के बावजूद अब जबकि कोरोना के खौफ को फिर से बड़ा किया जा रहा है, इसकी तीसरी लहर शुरू होने की बात कही जा रही थी। मरीजों के प्रति डॉक्टरों की लापरवाही भी सामने आने लगी है। मायागंज अस्पताल की कुव्यवस्था जग जाहिर है।
पिछले वर्ष जब कोरोना के खौफ को इसकी भयावहता से कई सौ गुणे अधिक कर दिया गया था तब मैंने इसे भोगा था। उस वक्त अपने कई आलेखों में उस अनुभव को लिखा था। लाइव रिपोर्टिंग की थी कोविड सेंटर से। डॉक्टर मरीज को देखने नहीं आते… मरीजों को एक कमरे में कैद कर दिया जाता था…। छोड़ दिया जाता है उन्हें उनकी हाल पर…। मायागंज से तब जो जिंदा लौटा वह उसका भाग्य न कि इलाज…!
मेरा तब स्पष्ट मत बना था कि कोरोना संक्रमण से मृत घोषित किसी भी व्यक्ति का पोस्टमार्टम करा दिया जाए तो पता चल जाएगा कि कोरोना से कम उचित देखभाल और दवाई के अभाव में अन्य बीमारियों से कोरोना संक्रमित मर रहे हैं। आज भी मेरा मत यही है, लेकिन कोरोना संक्रमण के साथ मरने वालों का सरकारी प्रोटोकॉल पोस्टमार्टम की इजाजत ही नहीं देता।
दूसरी ओर, इस दफे महानगरों और बड़े शहरों से आने वाली रिपोर्ट तो वाकई डराने वाली है। जो हो बात चिंता की तो है ही। हालांकि मृत्युदर कम है। अभी बहुत कम। एडजेक्ट आंकड़ा अभी निकाल नहीं पाया। लेकिन, जिस किसी के घर का कोई मरता है उसके घर-परिवार पर क्या बीतता है यह वही समझ सकता है जिसका कोई अपना मरा हो। उसके लिए किसी अपने का जाना एक आंकड़ा नहीं उसके लिए पूर्ति नहीं की जा सकने वाली क्षति है। अगर कोई युवा या प्रौढ़ चला गया तो अगले तीन दशक तक वह परिवार अपने पुरानी स्थिति में आने के लिए संघर्ष करता है। ऐसा देखा है मैंने।
खैर, तर्क-प्रतितर्क के बीच में फँसा हूँ। मेरे जैसे कई और लोग द्वंद्व में जी रहे होंगे कि कोरोना से डरना है या नहीं, डरना है तो कितना डरना है…! परिवार की समाज की चिंता कहती है कि सतर्कता तो बरतनी ही है। हालांकि यहां फिर प्रतितर्क आ जाता है कि क्या दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने वाले हम मध्यमवर्गीय या गरीब लोग अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार से अधिक सतर्कता बरत सकते हैं? तीसरी लहर लहर का भोकाल जबरदस्त चल रहा है। जगह-जगह लोग भयभीत हैं। यही तो है डर, यानी डर पैदा कीजिए कभी भाव बढ़ेगा। जस्ट इमेजिंग फुटपाथ से लेकर वीआईपी दुकानों तक में मांस के रेट में अचानक चढ़ाव हो गया। ऐसे कई उदाहरण है। तो क्या खेला शुरू?




