रिपोर्ट – धर्मेंद्र कुमार!
_आयकर रिटर्न से लेकर सर्विस बुक तक तैयार करता था गिरोह, फर्जी आई-कार्ड और सरकारी मुहरों से कायम करता था भरोसा; एक शिकायत से खुला बड़ा राज
सरकारी नौकरी पाने की चाहत को निशाना बनाकर लोगों से लाखों रुपये की ठगी करने वाले एक कथित नेटवर्क का मोतिहारी में खुलासा हुआ है। यह मामला सिर्फ एक महिला से 25 लाख रुपये की ठगी तक सीमित नजर नहीं आ रहा है। पुलिस की शुरुआती कार्रवाई में जिस तरह अलग-अलग विभागों के आई-कार्ड, ज्वाइनिंग लेटर, सर्विस बुक और अन्य दस्तावेज मिलने की बात सामने आई है, उससे पुलिस अब इस पूरे मामले को एक संभावित संगठित नेटवर्क के एंगल से जांच रही है।
इस कथित गिरोह पर आरोप है कि वह सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को ऐसा भरोसा दिलाता था कि सामने वाले को यह महसूस होने लगता था कि उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया वास्तव में सरकारी स्तर पर चल रही है। इसके लिए केवल मौखिक आश्वासन नहीं दिया जाता था, बल्कि कथित तौर पर फर्जी सरकारी दस्तावेज, विभागीय मुहर, आईडी कार्ड, सर्विस बुक और नियुक्ति से जुड़े कागजात तक तैयार किए जाते थे।
यही वजह बताई जा रही है कि पीड़ित लंबे समय तक आरोपियों पर भरोसा करते रहे और अलग-अलग चरणों में बड़ी रकम देते रहे।
एक शिकायत ने खोला नेटवर्क का दरवाजा
इस पूरे मामले की शुरुआत छतौनी थाना क्षेत्र के खुदानगर मोहल्ले की रहने वाली शबनम खातून की शिकायत से हुई। महिला ने आरोप लगाया कि सरकारी शिक्षक की नौकरी दिलाने के नाम पर उससे करीब 25 लाख रुपये लिए गए।
उसके मुताबिक, करीब 17 लाख रुपये नकद और लगभग 8 लाख रुपये ऑनलाइन माध्यम से लिए गए। आरोप है कि वर्ष 2023 से शुरू हुआ पैसे लेने का सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा।
जब नौकरी नहीं मिली और पैसे वापस मांगने पर कथित तौर पर धमकियां मिलने लगीं, तब महिला पुलिस के पास पहुंची।
14 सितंबर को शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और अगले दिन एक आरोपी असदुल्ला को गिरफ्तार किया। इसके बाद जांच में मिले दस्तावेजों ने पुलिस का ध्यान इस कथित ठगी के बड़े नेटवर्क की ओर खींचा।
नौकरी का सपना बेचता था कथित नेटवर्क
जांच में सामने आए आरोपों के मुताबिक, कथित गिरोह सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को अपने जाल में फंसाता था।
लोगों से कहा जाता था कि सरकारी विभागों में संपर्क है और पैसे देने पर नियुक्ति कराई जा सकती है। इसके बाद एक साथ बड़ी रकम मांगने के बजाय अलग-अलग चरणों के नाम पर पैसे लिए जाते थे।
कभी कागजात तैयार करने के नाम पर रकम, कभी अधिकारी से संपर्क कराने के नाम पर, तो कभी नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाने के नाम पर पैसे लेने का आरोप है।
इस तरीके से पीड़ितों को यह लगता रहता था कि उनकी नौकरी की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
सिर्फ कागज नहीं, पूरा सरकारी सिस्टम जैसा दिखाने की कोशिश
इस मामले में पुलिस को सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात कथित तौर पर तैयार किए गए दस्तावेज हैं।
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी के पास से 10-12 आईडी कार्ड, ज्वाइनिंग लेटर और दो सर्विस बुक बरामद हुई हैं। इन दस्तावेजों का सत्यापन संबंधित विभागों से कराया जा रहा है।
आरोप है कि गिरोह सरकारी विभागों के नाम, पद, मुहर और लेटर नंबर जैसी चीजों का इस्तेमाल कर ऐसे दस्तावेज तैयार करता था, जिन्हें देखकर सामान्य व्यक्ति को उनके फर्जी होने का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता था।
यानी ठगी का तरीका केवल पैसे लेकर गायब हो जाना नहीं था, बल्कि कथित तौर पर ऐसा पूरा माहौल तैयार किया जाता था जिससे पीड़ित को नौकरी मिलने का विश्वास बना रहे।
आयकर देने का दिखावा भी जांच के दायरे में
इस नेटवर्क के काम करने के तरीके को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। आरोप है कि लोगों के सामने खुद को विश्वसनीय दिखाने के लिए आयकर देने और आर्थिक रूप से सक्षम होने जैसी गतिविधियों का भी सहारा लिया जाता था।
इससे सामने वाले व्यक्ति को यह एहसास कराया जाता था कि आरोपी कोई सामान्य ठग नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा प्रभावशाली व्यक्ति है।
हालांकि, आयकर से जुड़े किसी दस्तावेज या रिकॉर्ड की वास्तविकता और उसके इस्तेमाल की भूमिका की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही होगी।
अगर जांच में यह पहलू सही पाया जाता है तो यह भी महत्वपूर्ण होगा कि कथित नेटवर्क ने अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए किस तरह के दस्तावेज और वित्तीय गतिविधियों का इस्तेमाल किया।
सर्विस बुक तक पहुंचा फर्जीवाड़ा
सरकारी नौकरी के नाम पर ठगी के मामलों में सामान्य तौर पर फर्जी नियुक्ति पत्र या आईडी कार्ड का इस्तेमाल सामने आता है। लेकिन इस मामले में सर्विस बुक की बरामदगी जांच को एक अलग दिशा दे रही है।
सर्विस बुक सरकारी कर्मचारियों की सेवा से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। ऐसे में पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि बरामद सर्विस बुक किसके नाम पर है, उसमें दर्ज विवरण कहां से लिया गया और उसे तैयार करने में किसकी भूमिका रही।
इसी तरह बरामद आई-कार्ड और ज्वाइनिंग लेटर भी जांच का अहम हिस्सा हैं।
क्या अकेले आरोपियों ने तैयार किया पूरा सिस्टम?
यही सवाल अब पुलिस जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
अगर फर्जी दस्तावेजों में सरकारी कार्यालयों के नाम, विभागीय मुहर, लेटर नंबर, पद और सेवा से संबंधित विवरण का इस्तेमाल हुआ है तो पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि यह जानकारी आरोपियों तक पहुंची कैसे।
क्या आरोपियों ने खुद यह पूरा सिस्टम तैयार किया?
क्या किसी ऐसे व्यक्ति ने उनकी मदद की, जिसे सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली और दस्तावेजों की जानकारी थी?
क्या किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की कोई भूमिका रही?
या फिर आरोपियों ने उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी का इस्तेमाल कर पूरा फर्जी दस्तावेज तैयार किया?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के सत्यापन और पुलिस की आगे की जांच के बाद ही सामने आएगा।
सरकारी कर्मचारी की संलिप्तता अभी साबित नहीं
पुलिस इस मामले में सरकारी विभाग के किसी कर्मचारी या अधिकारी की संभावित भूमिका की भी जांच कर रही है। हालांकि, अभी तक किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की संलिप्तता साबित नहीं हुई है।
पुलिस बरामद दस्तावेजों को संबंधित विभागों के पास भेजकर उनका सत्यापन कराएगी। यह पता लगाया जाएगा कि दस्तावेज वास्तविक हैं या फर्जी, उन पर लगी मुहरों का स्रोत क्या है और जिन लोगों के नाम पर आईडी कार्ड या सर्विस बुक मिली है, उनका सरकारी रिकॉर्ड से कोई संबंध है या नहीं।
जांच के दौरान यदि किसी विभागीय व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके आधार पर आगे कार्रवाई की जा सकती है।
तीन साल तक चलता रहा भरोसे का खेल
शबनम के मामले में आरोप है कि कथित नेटवर्क ने करीब तीन साल तक नौकरी मिलने का भरोसा बनाए रखा।
यही इस तरह की ठगी का सबसे बड़ा तरीका माना जा रहा है—पीड़ित से एक बार में लाखों रुपये लेने के बजाय छोटी-छोटी रकम ली जाती है और हर बार कोई नया कारण बताकर उसे अगली किस्त देने के लिए तैयार किया जाता है।
पीड़िता के मुताबिक, कभी 20 हजार, कभी 30 हजार और कभी 50 हजार रुपये लिए गए। रकम बढ़ती गई और नौकरी की उम्मीद बनी रही।
जब महिला ने नौकरी छोड़कर पैसे वापस मांगे तो कथित तौर पर उसे डराने-धमकाने का भी आरोप सामने आया।
कितने लोगों से हुई ठगी? पुलिस तलाश रही जवाब
अब पुलिस की जांच का दायरा केवल 25 लाख रुपये की कथित ठगी तक सीमित नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस नेटवर्क ने अन्य लोगों को भी सरकारी नौकरी का झांसा देकर पैसे लिए?
बरामद 10-12 आईडी कार्ड किसके हैं?
ज्वाइनिंग लेटर कितने लोगों के लिए तैयार किए गए थे?
सर्विस बुक किन नामों से बनाई गई?
क्या इन दस्तावेजों के आधार पर किसी को नौकरी मिलने का भरोसा दिया गया?
कितने लोगों ने इस कथित नेटवर्क को पैसा दिया?
क्या ठगी की रकम करोड़ों तक पहुंच सकती है?
पुलिस अब इन सभी बिंदुओं पर जानकारी जुटा रही है।
पुलिस के सामने अब नेटवर्क की पूरी कड़ी जोड़ने की चुनौती
एक आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब कथित नेटवर्क की पूरी कड़ी तलाशने में जुटी है। इसमें मुख्य आरोपी बताए जा रहे अनवर जावेद समेत अन्य संदिग्धों की भूमिका की जांच की जा रही है।
पुलिस बरामद दस्तावेजों, वित्तीय लेनदेन और आरोपियों के संपर्कों की जांच कर सकती है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित ठगी का नेटवर्क कितने लोगों तक फैला हुआ था।
अगर अन्य पीड़ित सामने आते हैं तो मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
नौकरी के नाम पर ठगी से बचने के लिए पुलिस की अपील
पुलिस ने लोगों से सरकारी नौकरी के नाम पर पैसे मांगने वाले लोगों से सावधान रहने की अपील की है।
अधिकारियों का कहना है कि सरकारी नौकरी के लिए निर्धारित परीक्षा, चयन प्रक्रिया या संबंधित विभाग की आधिकारिक प्रक्रिया होती है। कोई व्यक्ति यदि बिना परीक्षा या निर्धारित प्रक्रिया के सीधे पैसे लेकर नौकरी दिलाने का दावा करता है तो उसके दावे की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।
सरकारी नौकरी से संबंधित किसी भी नियुक्ति पत्र, आईडी कार्ड, सर्विस बुक या अन्य दस्तावेज को केवल देखकर वास्तविक नहीं मानना चाहिए। संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या कार्यालय से उसकी पुष्टि करना जरूरी है।
एक शिकायत से शुरू हुई जांच, अब कई सवालों के जवाब तलाश रही पुलिस
मोतिहारी में सामने आया यह मामला फिलहाल एक महिला से 25 लाख रुपये की कथित ठगी से शुरू हुआ है, लेकिन पुलिस को मिले दस्तावेजों ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है।
अब असली तस्वीर पुलिस जांच के बाद सामने आएगी—क्या यह केवल कुछ लोगों की ठगी थी या सरकारी नौकरी के नाम पर लंबे समय से चल रहा बड़ा नेटवर्क? कितने लोग इसके निशाने पर आए? और फर्जी सरकारी दस्तावेज तैयार करने के पीछे आखिर किस-किस की भूमिका थी?
इन सवालों का जवाब पुलिस की जांच और बरामद दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगा।



