वो रात जब बिहार ने लोकतंत्र को बचाया: आपातकाल के 51 वर्ष और हमारी शाश्वत विरासत- संजय सरावगी!

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:- रवि शंकर अमित!

श्री संजय सरावगी , प्रदेश अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी – बिहार |

मैं उस पीढ़ी से नहीं हूँ जिसने सन 1975 के आपातकाल के उस दंश को साक्षात अपनी चमड़ी पर झेला हो, लेकिन मैं उस मिट्टी से आता हूँ जिसके कण-कण में आपातकाल के विरुद्ध लड़े गए संघर्ष की गाथाएं रची-बसी हैं। पटना की वही ऐतिहासिक गलियां, वही पुराने मोहल्ले और वही मकान, जहाँ 25 जून 1975 की काली रात को पुलिस के बूटों की आवाज गूंजी थी और तानाशाही के आदेश पर घरों के दरवाजे तोड़े गए थे—उसी वातावरण में मैं बड़ा हुआ हूँ। मेरे परिवार में, मेरे संगी-साथियों में, और विशेष रूप से हमारे संगठन के भीतर आज भी ऐसे असंख्य जीवंत स्तंभ मौजूद हैं, जिन्होंने उस दमनकारी रात को जिया है, भोगा है और उसे परास्त किया है। आज भी जब 25 जून की तारीख आती है, तो उनकी आंखों में एक अजीब सी तल्खी और संकल्प की चमक उतर आती है। यह लेख केवल इतिहास के पन्नों को पलटने का प्रयास नहीं है; यह उस जीवंत स्मृति का एक संप्रभु दस्तावेज है जो बिहार भाजपा के प्रत्येक कार्यकर्ता के खून में, उसकी वैचारिक चेतना में अविरल बहती है। 25 जून 1975, रात के ठीक ग्यारह बजे, दिल्ली का रामलीला मैदान एक ऐतिहासिक गूंज का गवाह बन रहा था जब लोकनायक श्रद्धेय जयप्रकाश नारायण जी ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की उन अमर पंक्तियों का आह्वान किया, जो आने वाले समय में एक पूरे युग का नारा बन गईं: “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” लेकिन उसी रात, सत्ता के अहंकार में डूबी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के लोकतंत्र का गला घोंट दिया और संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग कर आंतरिक आपातकाल थोप दिया। एक झटके में नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, न्यायालयों के हाथ बांध दिए गए और प्रेस की जुबान पर सेंसरशिप का ताला लगा दिया गया। पटना के कदमकुआं स्थित आवास से लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को बंदी बना लिया गया, परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी और आदरणीय लालकृष्ण आडवाणी जी जैसे प्रखर नेताओं को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया, और मात्र एक रात के भीतर देश भर से एक लाख से अधिक राष्ट्रभक्तों को जेलों में ठूंस दिया गया। 26 जून की सुबह जब बिहार की आंखें खुलीं, तो सड़कें भले ही सन्नाटे में डूबी थीं, लेकिन हर घर के भीतर, हर चूल्हे के पास प्रतिरोध की एक मूक आग सुलगने लगी थी।
आपातकाल के इतिहास को लेकर अक्सर दरबारी इतिहासकारों ने सच को छुपाने का प्रयास किया है और वे यह कभी नहीं लिखते कि आपातकाल का सबसे सुनियोजित, अनुशासित और देशव्यापी प्रतिरोध यदि कहीं से संचालित हो रहा था, तो उसकी भूमि बिहार थी; और उस प्रतिरोध की रीढ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भारतीय जनसंघ के निष्ठावान कार्यकर्ता थे। जब देश के बड़े-बड़े राजनीतिक दल बिखर चुके थे, शीर्ष नेता या तो जेलों की कालकोठरी में थे या परिदृश्य से गायब थे, तब संघ का संगठनात्मक ढांचा पूरी मुस्तैदी के साथ अकेला खड़ा था। सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन शाखाओं का वह अभेद्य नेटवर्क भूमिगत होकर भी अटूट रहा। बंद कमरों और गुप्त तहखानों में साइकिलों पर घूम-घूम कर सामग्रियां जुटाई जाती थीं, जहां रातों-रात तानाशाही विरोधी पर्चे छपते थे और एक हाथ से दूसरे हाथ तक गुप्त संदेश पहुंचाए जाते थे। पटना से भागलपुर, भागलपुर से गया, गया से मुजफ्फरपुर और मुजफ्फरपुर से होते हुए मेरे अपने गृह क्षेत्र दरभंगा तक यह गुप्त संचार तंत्र पूरी तरह सक्रिय था। जिस संगठन को दमनकारी सत्ता ने गैर-कानूनी घोषित कर दिया था, वही संगठन उस दौर में भारत के लोकतंत्र की अंतिम जीवित धड़कन बनकर धड़क रहा था। 
इस आंदोलन ने देश को ऐसे नायक दिए जिनका जीवन आने वाली सदियों तक प्रेरणा देता रहेगा, जिनमें परम आदरणीय जननायक कर्पूरी ठाकुर जी का नाम बिहार के हर संघ और भाजपा कार्यकर्ता के लिए केवल एक राजनेता का नाम नहीं है—वे स्वयं में राज्य के स्वाभिमान और प्रतिरोध का साक्षात पर्याय हैं। पूरे 19 महीने के आपातकाल के दौरान वे भूमिगत रहे और पुलिस की खुफिया नजरों से बचने के लिए उन्होंने कभी सिख का भेष धरा, तो कभी मुसलमान बनकर गांवों में घूमते रहे। नेपाल की तराई से लेकर दिल्ली और महाराष्ट्र तक, वे तीन दिन से ज्यादा कभी एक स्थान पर नहीं रुके और पूरी सरकारी मशीनरी उन्हें ढूंढने में नाकाम रही। जब वे प्रकट हुए, तो अपनी मर्जी से; पटना में अप्सरा सिनेमा के समीप एक विशाल जनसभा में, जहां श्रद्धेय जेपी मंच पर उपस्थित थे, कर्पूरी जी अचानक माइक के सामने आकर खड़े हो गए और दहाड़े: “मैं कर्पूरी ठाकुर हूँ।” वह कोई आत्मसमर्पण नहीं था, वह तानाशाही के मुंह पर बिहार का एक ऐसा ऐतिहासिक तमाचा था जिसने सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया। इसी तरह, हमारे वरिष्ठ नेता श्रद्धेय जॉर्ज फर्नांडिस जी देश भर में घूम-घूम कर भूमिगत क्रांति की अलख जगाते रहे, जिन्हें बाद में बड़ौदा डायनामाइट कांड में झूठा फंसाया गया। इस क्रूरता की पराकाष्ठा यह थी कि इंदिरा गांधी की जेलों में अमानवीय व्यवहार के कारण श्रद्धेय जेपी की दोनों किडनियां फेल हो गईं और 12 नवंबर 1975 को जब उन्हें अत्यंत खराब स्वास्थ्य के कारण रिहा किया गया, तब तक उनका शरीर पूरी तरह जर्जर हो चुका था। जिस महामानव ने बिहार के छात्रों और युवाओं को “संपूर्ण क्रांति” का महास्वप्न दिखाया था, उस राष्ट्रसंत को तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जेल की यातनाओं ने असमय मृत्यु की ओर धकेल दिया।
सन 1974 में जब पटना विश्वविद्यालय के प्रांगण से इस आंदोलन की चिंगारी सुलगनी शुरू हुई थी, तब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र कार्यकर्ता अग्रिम पंक्ति में सीना तानकर खड़े थे। ‘बिहार छात्र संघर्ष समिति’ में जनसंघ और संघ से प्रेरित युवाओं की सक्रियता सबसे प्रखर थी। मार्च 1974 में जब ऐतिहासिक विधानसभा घेराव हुआ, तो पुलिस की लाठियां खाने वाले और गोलियों के सामने सीना अड़ाने वाले वे नौजवान ही थे, जो आगे चलकर आज की भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक और सांगठनिक नींव बने। पूर्व उपमुख्यमंत्री श्रद्धेय सुशील कुमार मोदी जी इसी तपे-तपाए छात्र आंदोलन की उपज थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री आदरणीय श्रद्धेय राम विलास पासवान जी ने भी इसी मिट्टी से संघर्ष का ककहरा सीखा था। मैं पूरी विनम्रता और उतने ही गर्व के साथ यह उद्घोष करना चाहता हूँ कि भारतीय जनता पार्टी का डीएनए आपातकाल के इसी राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध की कोख से जन्मा है। हमारे पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने महीनों जेलों में यातनाएं सहीं, आरएसएस के स्वयंसेवकों ने राष्ट्र की लोकतांत्रिक आत्मा को जीवित रखा और विद्यार्थी परिषद के अनगिनत छात्रों ने भारत माता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपनी सुनहरे भविष्य की डिग्रियां तक हंसते-हंसते त्याग दीं। जब 1977 के ऐतिहासिक आम चुनाव हुए, तो श्रद्धेय जेपी के आशीर्वाद और कुशल मार्गदर्शन में ‘जनता पार्टी’ का उदय हुआ। उस समय बिहार ने वह युगांतकारी कार्य कर दिखाया जिसकी कल्पना सत्ता के मतवाले गलियारों में किसी ने नहीं की थी। बिहार की जनता ने इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को ऐसी करारी शिकस्त दी कि देश के इतिहास में पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हो गई। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अकाट्य तथ्य है कि बिहार ने ही इस देश को उसका खोया हुआ लोकतंत्र वापस लाकर दिया।
आज, जब हम आपातकाल की इस 51वीं वर्षगांठ के मुहाने पर खड़े हैं, मैं भारतीय जनता पार्टी के अपने एक-एक देवतुल्य कार्यकर्ता और बिहार के प्रबुद्ध नागरिकों से आह्वान करना चाहता हूँ कि हम उस महान और अद्वितीय विरासत के सीधे वारिस हैं। जब हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी यह कहते हैं कि आपातकाल का वह काला कालखंड एक ऐसा घाव है जिसे कोई भी भारतीय कभी भूल नहीं सकता, तो वे केवल इतिहास के किसी पन्ने को नहीं दोहरा रहे होते। वे वास्तव में उस अप्रतिम त्याग, तपस्या और बलिदान को अपनी साष्टांग अंजलि दे रहे होते हैं जो जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों गुमनाम कार्यकर्ताओं ने अपने पसीने और खून से लिखी थी। वे उस बिहार की पावन भूमि को नमन कर रहे होते हैं, जिसने देश में तानाशाही के खिलाफ सबसे पहले अपनी सिंहगर्जना की थी और जो अंतिम सांस तक लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ता रहा। जब इस महान राष्ट्र के लोकतांत्रिक ताने-बाने पर सबसे भीषण और क्रूर आघात हुआ, तब सबसे पहले उठ खड़ा होने वाला, अपनी पीढ़ियों की सबसे बड़ी कीमत चुकाने वाला और सत्ता के अत्याचारों के सामने अंगद की तरह पैर जमाकर अंतिम विजय तक डटा रहने वाला कोई और नहीं—यही हमारा और आपका बिहार था। यही हमारा बिहार है, यही हमारी गौरवशाली राजनीतिक और सामाजिक विरासत है, और यह अटूट विरासत आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में जीवित है जिसे न तो कोई हमसे छीन सकता है और न ही कोई इसे इतिहास के पन्नों से मिटा सकता है। आइए, इस 51वीं वर्षगांठ पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि लोकतंत्र की इस मशाल को कभी धीमा नहीं पड़ने देंगे।
जय हिंद, जय बिहार!

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