लीची किसानों की हाहाकार सुनो सरकार – शाही लीची की मिठास और किसानों की पीड़ा का दर्दनाक सच!

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रिपोर्ट – संतोष तिवारी!

गर्मियों का मौसम आते ही भारत के कोने-कोने में एक नाम ऐसा है जो हर किसी की जुबान पर आ जाता है, वह है ‘शाही लीची’। बिहार के मुजफ्फरपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में उगने वाली यह लीची अपनी बेमिसाल मिठास, रसीले गूदे, मनमोहक खुशबू और अद्वितीय स्वाद के लिए पूरे देश में मशहूर है। यह सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि बिहार की पहचान, किसानों की आजीविका और लाखों लोगों की उम्मीदों का प्रतीक है। जैसे ही बाजार में लीची आनी शुरू होती है, लोगों के मन में उसकी मिठास का सपना जाग उठता है, और बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब इसका बेसब्री से इंतजार करते हैं। लेकिन इस बार का मौसम कुछ अलग है। किसानों के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें हैं, उनकी आँखों में निराशा और हताशा छाई हुई है, और बाजार में लीची के दाम आसमान छू रहे हैं। वजह? इस साल लीची के सिर्फ 25% पेड़ों में ही फल लगे हैं, और वह भी आकार में इतना छोटा कि पहले कभी ऐसा नहीं देखा गया। यह एक ऐसा संकट है जिसने लीची किसानों को हाहाकार मचाने पर मजबूर कर दिया है, और सरकार से मदद की गुहार लगाने को विवश कर दिया है।

शाही लीची का स्वाद और उसकी कमी का दर्द

शाही लीची का नाम सुनते ही जुबान में पानी आ जाता है। इसका गूदा मुँह में रखते ही पिघल जाता है, और एक अलग ही मिठास घोल देता है जो मन को मोह लेती है। इसकी खुशबू इतनी लुभावनी होती है कि दूर से ही इसका अहसास हो जाता है। लेकिन इस साल बाजार में जो लीची मिल रही है, उसका आकार देखकर हैरानी होती है। पहले जहाँ लीची के दाने अंगूर के आकार के होते थे, वहीं अब वे छोटे-छोटे मटर जैसे दिखते हैं। किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में इतना छोटा आकार कभी नहीं देखा। यह सिर्फ आकार का सवाल नहीं है, बल्कि यह उनकी मेहनत, उनकी उम्मीदों और उनके अस्तित्व का सवाल है। लीची के बाग को कटवाने के अलावा अब कोई उपाय नहीं बचा है, क्योंकि पेड़ों पर फल इतने कम और छोटे हैं कि उन्हें बेचकर भी लागत नहीं निकल पा रही है। सरकार भी किसी तरह की कोई मदद नहीं करती लीची किसानों को, और न ही कोई विभाग लीची किसानों के लिए जागरूकता अभियान चलाता है। यह स्थिति न केवल उपभोक्ताओं के लिए निराशाजनक है, बल्कि किसानों के लिए तो यह एक गहरे संकट का संकेत है जो उनके जीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है।

क्यों नहीं लगे फल? जलवायु परिवर्तन का कहर

लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉक्टर विकास दास ने बताया कि इस वर्ष लीची के कम फल लगने के पीछे मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा है। लीची के पेड़ों को फल देने के लिए एक विशेष तापमान और मौसम की आवश्यकता होती है। फरवरी-मार्च के महीने में जब पेड़ों पर बौर (फूल) आते हैं, तब हल्की ठंड और शुष्क मौसम अनुकूल होता है। लेकिन इस बार अनियमित बारिश और तापमान में अचानक बदलाव ने बौर को झड़ने पर मजबूर कर दिया। कई किसानों ने बताया कि बौर आने के बाद अचानक कीड़ों का प्रकोप बढ़ गया। दवा छिड़काव करने के बाद वे कीड़े बेहोश होकर पेड़ से गिर जाते हैं, लेकिन 24 घंटे के बाद फिर वे होश में आकर पेड़ों पर चढ़ने लगते हैं। इससे बचाव के लिए पेड़ों के जड़ों के पास प्लास्टिक बांधने पर वे नहीं चढ़ पा रहे हैं, लेकिन तब तक फूल झड़ चुके थे और फल नहीं लग पाए। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा — सिर्फ 25% पेड़ों ने ही फल दिया, और वह भी छोटे आकार में। यह जलवायु परिवर्तन का वह कहर है जो धीरे-धीरे लीची की खेती को खत्म कर रहा है, और किसानों को बेबस कर रहा है।

किसानों की मजबूरी और बाजार का आसमान छूता दाम

जब उत्पादन कम होता है, तो बाजार का नियम है कि दाम बढ़ जाते हैं। इस बार लीची का भाव 300 से 400 रुपये प्रति सैकड़ा (100 पीस) तक पहुँच गया है। एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार के लिए इस कीमत पर लीची खरीदना एक विलासिता बन गया है। जहाँ पहले लोग किलो के हिसाब से लीची खरीदते थे, अब वे सैकड़े के हिसाब से भी सोचने लगे हैं। वहीं किसानों के लिए यह स्थिति और भी पीड़ादायक है। उन्होंने पेड़ों की देखभाल, सिंचाई और कीटनाशकों पर काफी खर्च किया, लेकिन उत्पादन इतना कम हुआ कि वे अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं। किसान हरेराम सिंह शम्भूनाथ सिंह कहते हैं, “अब लीची को बचाना मुश्किल हो गया है। जलवायु परिवर्तन ने हमलोगों के ऊपर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है। सरकार भी लीची किसानों के प्रति उदासीन है। कोई जागरूकता अभियान या कार्यक्रम नहीं चलता है, सरकार या विभाग की ओर से, जिसके वजह से लीची किसानों में हाहाकार मचा हुआ है। हर साल इसी समय लीची बेचकर हम अपना गुजर-बसर करते हैं। इस बार तो मन कचोट रहा है। पेड़ों पर फल कम हैं और जो हैं, वह छोटे हैं। बाजार में भाव ऊँचा है, लेकिन हमारे पास बेचने को कम है।” यह दर्द सिर्फ एक किसान का नहीं, बल्कि पूरे मुजफ्फरपुर के लीची किसानों का है जो इस संकट से जूझ रहे हैं।

छोटे आकार का कारण — पोषण और मौसम का दोहरा प्रभाव

लीची के छोटे आकार के पीछे वैज्ञानिक कई कारण बता रहे हैं। पहला कारण है फूल आने के समय पर्याप्त परागण न होना। जब मौसम अनुकूल नहीं होता, तो मधुमक्खियाँ और अन्य परागणक कीट सक्रिय नहीं होते, जिससे फलों का आकार छोटा रह जाता है। दूसरा कारण है फल लगने के बाद पानी और पोषक तत्वों की कमी। इस बार कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनी, तो कहीं अत्यधिक बारिश ने जड़ों को नुकसान पहुँचाया। इस दोहरे प्रभाव ने लीची के दानों को सिकोड़ कर रख दिया। तीसरा कारण है मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी, क्योंकि लगातार खेती से मिट्टी की उर्वरता कम हो गई है। चौथा कारण है कीटों और बीमारियों का प्रकोप, जिसने फलों को कमजोर कर दिया। ये सभी कारण मिलकर लीची के आकार और गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं, और किसानों की मेहनत को बेकार कर रहे हैं।

सरकार की उदासीनता और जागरूकता अभियानों की कमी

लीची किसानों की सबसे बड़ी शिकायत सरकार की उदासीनता है। वे कहते हैं कि सरकार न तो कोई मुआवजा देती है, न ही कोई तकनीकी सहायता। कोई जागरूकता अभियान नहीं चलता, कोई कार्यशाला नहीं होती, कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। किसानों को यह नहीं बताया जाता कि जलवायु परिवर्तन से कैसे निपटें, कीटों से कैसे बचाव करें, या फलों के आकार को कैसे बढ़ाएँ। उद्यान रत्न किसान भोलानाथ झा ने बताया कि लीची किसानों की इस दुर्दशा के लिए स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार ज्यादा जिम्मेदार है। उन्होंने बताया कि इस विपदा के लिए उन्होंने 2024 और 2025 में सरकार और सरकार के सिस्टम को अवगत कराया था, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ। थोड़ा बहुत इसके लिए सरकार ने दवा वगैरह की खरीदारी मनमाने तरीके से करके खाना पूर्ति कर ली, लेकिन असली समस्या का समाधान नहीं हुआ। उनका मानना है कि सरकार को किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए, उन्हें तकनीकी सहायता, मुआवजा और जागरूकता अभियानों के माध्यम से मदद करनी चाहिए, ताकि लीची की खेती को बचाया जा सके।

आने वाले दिनों में क्या होगा? — संकट के बादल और उम्मीद की किरण

आने वाले दिनों में लीची किसानों के लिए संकट के बादल और गहरे हो सकते हैं। उद्यान रत्न किसान भोलानाथ झा का मानना है कि अगर आने वाले वर्षों में मौसम का यह पैटर्न जारी रहा, तो शाही लीची का उत्पादन और भी प्रभावित हो सकता है। किसानों को अब नई तकनीकों और जलवायु-अनुकूल खेती की ओर रुख करना होगा। जैसे—ड्रिप इरिगेशन, मल्चिंग, और मौसम पूर्वानुमान के आधार पर समय पर छिड़काव। उन्हें जैविक खेती की ओर भी ध्यान देना होगा, ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे। सरकार को भी किसानों को मुआवजा और तकनीकी सहायता देने की जरूरत है, ताकि इस कीमती फल की खेती बचाई जा सके। लीची अनुसंधान केंद्र को भी नई किस्में विकसित करनी चाहिए जो जलवायु परिवर्तन के अनुकूल हों। किसानों को एकजुट होकर अपनी समस्याओं को उठाना होगा, और सरकार पर दबाव बनाना होगा ताकि उनकी बात सुनी जाए।

अंत में — मिठास की याद और उम्मीद

शाही लीची का नाम सुनते ही जो मिठास जेहन में उतरती है, वह केवल स्वाद की नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा और किसानों की मेहनत की भी है। यह मिठास हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमें हमारे गाँवों और खेतों की याद दिलाती है। इस साल बाजार में लीची मिल रही है, लेकिन वह पहले जैसी नहीं है — न आकार में, न मात्रा में, और न ही कीमत में। लेकिन उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में किसान और वैज्ञानिक मिलकर इस संकट का हल निकाल लेंगे। तब तक हम उस छोटी सी लीची को भी दिल से सराहें, जिसने इस कठिन मौसम के बावजूद हमें अपनी मिठास दी है। क्योंकि असली मिठास केवल फल में नहीं, बल्कि उसकी खेती से जुड़ी मेहनत, संघर्ष और उम्मीद में भी होती है। हमें किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए, उनकी पीड़ा को समझना चाहिए, और सरकार से मांग करनी चाहिए कि वह लीची किसानों की हाहाकार सुने। केवल तभी शाही लीची की मिठास हमेशा बनी रहेगी, और किसानों के चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आएगी।

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