प्रस्तुति -: डॉ अनमोल कुमार
अधिकमास की उत्पत्ति होने पर यह सभी से तिरस्कृत हुआ और दुःखी होकर विष्णुलोक गया। वहाँ अधिकमास ने नारायण से कहा कि प्रत्येक मास का एक स्वामी होता है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है, जिस कारण सभी मुझे मलमास, मलिम्लुच आदि नामों से पुकारते हैं और सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृकार्य वर्जित किये हैं। तब भगवान् विष्णु ने अधिकमास को अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और यह पुरुषोत्तम मास कहलाया।
श्रीनारायण कहते हैं कि –
गुणों से, कीर्ति के अनुभाव से, षडैश्वर्य से, पराक्रम से, भक्तों को वर देने से और जो मेरे अन्य गुण हैं, उनसे मैं लोक में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। वैसे ही यह मलमास भी लोकों में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध होगा ।
पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं।
इसके पुरुषोत्तम नाम से सारा जगत पवित्र होगा। मेरी समानता पाकर यह अधिमास सब मासों का राजा होगा। यह अधिमास जगत्पूज्य एवं जगत से वन्दना करवाने के योग्य होगा। जो इसमें पूजा और व्रत करेंगे, उनके दुःख और दारिद्र्य का नाश होगा। चैत्रादि सब मास सकाम हैं, इसको हमने निष्काम किया है। इसको हमने अपने समान समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनाया है। जो प्राणी सकाम अथवा निष्काम होकर अधिमास का पूजन करेगा, वह अपने सब कर्मों को भस्म कर निश्चय ही मुझको प्राप्त होगा।
श्रीभगवान यह भी कहते हैं कि जैसे हल से खेत में बोये हुए बीज करोड़ो गुणा बढ़ते हैं, वैसे ही मेरे पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य करोड़ो गुणा अधिक होता है।




