भारतीय जनता पार्टी ने सियासत की परिभाषा कैसे बदल दी? एक नई राजनीतिक विचारधारा का उदय!

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रिपोर्ट -संतोष तिवारी!

आजादी के बाद से भारतीय राजनीति में कांग्रेस का एकछत्र राज था। दशकों तक सत्ता के गलियारों में उसी का वर्चस्व रहा। लेकिन क्या कांग्रेस ने इस लंबे शासनकाल में बहुसंख्यकों की आवाज को सुना? या फिर उसने सत्ता में बने रहने के लिए अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण और बहुसंख्यकों की मूलभूत आवश्यकताओं को लगातार अनदेखा किया? यह सवाल आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है। कांग्रेस ने वर्षों तक बहुसंख्यकों की पहचान, उनकी संस्कृति और उनकी आस्था को सिर्फ़ एक वोट बैंक के रूप में देखा, न कि उस समुदाय के अभिन्न अंग के रूप में, जिसने इस देश को आकार दिया। उनकी आवाज़ को या तो दबाया गया, या उसे सांप्रदायिक करार देकर बदनाम किया गया। यह एक ऐसी राजनीतिक चाल थी, जो वोट बैंक की खातिर बहुसंख्यकों को न्याय और सम्मान से वंचित करती रही।

लेकिन फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उदय हुआ। इसने न सिर्फ़ उस दबी हुई आवाज़ को बुलंद किया, बल्कि पूरे देश की राजनीति की परिभाषा को ही बदल दिया। भाजपा ने यह दिखाया कि सियासत केवल सत्ता के खेल का नाम नहीं है, बल्कि वह एक विचारधारा है, एक राष्ट्रनिर्माण का मार्ग है। जिसे पहले सांप्रदायिक लेबल लगाकर खारिज कर दिया जाता था, आज वही विचारधारा देश के कोने-कोने में स्वीकार की जा रही है। यह बदलाव विपक्ष के लिए न सिर्फ़ चुनौतीपूर्ण है, बल्कि अब वे इसे समझ भी नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उनकी मानसिकता अब भी पुराने ढर्रे पर चल रही है।

बंगाल की सियासत में इतिहास रचने वाली सफलता

पश्चिम बंगाल का उदाहरण लें। एक राज्य जिसे कभी वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, वहाँ भाजपा ने न सिर्फ़ पैर जमाए, बल्कि सत्ता तक पहुँच गई। यह कैसे संभव हुआ? सिर्फ़ इसलिए कि भाजपा ने बहुसंख्यकों की चुप्पी को तोड़ा और उन्हें वह पहचान दी जिसे वे वर्षों से तलाश रहे थे। बांग्ला की जनता ने महसूस किया कि उनका अस्तित्व, उनकी संस्कृति और उनकी आस्था को नकारने की राजनीति अब खत्म होनी चाहिए। यही कारण है कि ‘जय श्री राम’ के नारे, राम मंदिर आंदोलन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने वहाँ एक नई पहचान बनाई, जिसे विपक्ष के लिए समझना और स्वीकार करना नामुमकिन सा लग रहा है।

‘सांप्रदायिकता’ से ‘विचारधारा’ तक का सफर

पहले जब भी किसी की बात ‘हिंदू हित’ या ‘संस्कृति’ पर होती थी, तो उसे तुरंत ‘सांप्रदायिक’ कहकर ब्रांडेड कर दिया जाता था। लेकिन भाजपा ने इस मिथक को तोड़ दिया। उसने साबित कर दिया कि बहुसंख्यकों की चिंता और उनके विकास की बात करना कोई सांप्रदायिकता नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र और मानवाधिकार का मूल सिद्धांत है। आज देशभर में जिस तरह से भाजपा को समर्थन मिल रहा है, वह दर्शाता है कि यह एक गहरी विचारधारा बन चुकी है, जो लोगों के दिलों में बस गई है। यह कोई चुनावी जोड़-तोड़ नहीं है, बल्कि एक जागृति है, एक चेतना है।

विपक्ष क्यों समझ नहीं पा रहा है?

इस नई वास्तविकता को समझना विपक्ष के लिए मुमकिन नहीं, बल्कि नामुमकिन लग रहा है। कांग्रेस और उसके साथी दलों की विचारधारा अब भी तुष्टिकरण, परिवारवाद और वोट बैंक की राजनीति पर आधारित है। वे यह नहीं मानना चाहते कि भारत की जनता अब आत्म-सम्मान, सांस्कृतिक गौरव और विकास की राजनीति चाहती है। जब तक विपक्ष अपनी पुरानी सोच को बदलकर जनता की मूल जरूरतों और भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं करेगा, तब तक वह भाजपा के सामने टिक नहीं पाएगा। विपक्ष को चाहिए कि वह अपनी राजनीति करने की शैली में आमूलचूल बदलाव लाए। उसे सरकार से सिर्फ़ जंग छेड़ने के बजाय, जनता की समस्याओं को प्रमुखता से उठाना होगा। सड़कों से लेकर स्कूलों तक, स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर रोजगार तक, हर मुद्दे को अपनी आवाज़ बनाना होगा। विपक्ष की भूमिका सरकार को घेरना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह ठहराते हुए जनता के हितों की रक्षा करना है।

लंबी सत्ता पारी: कारण और संभावनाएँ

यह स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी और उसकी विचारधारा लंबे समय तक सत्ता में बनी रहेगी। इसके पीछे एक मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट नीति और जनता के बीच गहरी पैठ है। जब तक विपक्ष अपनी विचारधारा में बदलाव नहीं लाता और जनता की भावनाओं से तालमेल नहीं बिठाता, यह पारी लंबी चलती रहेगी। यह कहना मुश्किल है कि यह कब तक चलेगी, लेकिन यह तय है कि जब तक लोकतंत्र में जनता की आवाज को दबाने की कोशिश होगी, तब तक भाजपा जो बहुसंख्यकों की आवाज बुलंद करती है, उसे जनता का अटूट समर्थन मिलता रहेगा।

निष्कर्ष

आज भारतीय राजनीति में बदलाव की हवा चल रही है। भाजपा ने सियासत की पारंपरिक परिभाषा को तोड़कर एक नई परिभाषा दी है – “जनता की आवाज़, जनता की पहचान, और जनता का विकास।” यह एक ऐसी विचारधारा है, जो सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा को दर्शाती है। विपक्ष को अब जागना होगा। उसे अपनी पुरानी सोच से बाहर निकलना होगा और जनता के बीच जाकर उनकी मूलभूत समस्याओं को हल करने का प्रयास करना होगा। यही एकमात्र रास्ता है, जिससे वह इस लंबी सत्ता पारी को चुनौती दे सकता है। अन्यथा, यह पारी लंबी चलेगी, और इसका अंत कब होगा, यह तो केवल समय ही बताएगा।

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