विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) जयंती पर विशेष आलेख!

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:-अनमोल कुमार

विनायक दामोदर सावरकर – क्रांतिकारी, लेखक, इतिहासकार, समाज सुधारक और स्वतंत्रता संग्राम के “स्वातंत्र्यवीर”। इन्हें अंग्रेजों ने 2 बार आजीवन कारावास यानी 50 साल काला पानी की सजा दी थी। इनका जन्म 28 म ई 1883 भागूर, नासिक में हुआ।

जीवन के 4 बड़े काम – जिनसे देश की दिशा बदली*
काम क्या किया क्यों जरूरी था
सशस्त्र क्रांति का बिगुल 1904 में “अभिनव भारत” गुप्त संगठन बनाया। लंदन में इंडिया हाउस से पिस्तौल, बम के कारतूस भारत भेजे। उस समय नरम दल की अर्जी-विनती से आजादी नहीं मिल रही थी। सावरकर ने कहा – “स्वतंत्रता मांगने से नहीं, छीनने से मिलती है।”

1857 का स्वातंत्र्य समर” किताब 1909 में लंदन में लिखी। पहली बार बताया कि 1857 “सिपाही विद्रोह” नहीं, “पहला स्वतंत्रता संग्राम” था। अंग्रेजों ने किताब पर रोक लगाई। भगत सिंह, सुभाष बोस इसी किताब को जेब में रखते थे।
काला पानी की सजा – 1911-1924 अंडमान की सेल्युलर जेल में 11 साल। कोल्हू में बैल की जगह जोते गए, दीवारों पर कील-कोयले से कविता लिखी। जेल से ही “हिंदुत्व” और “विज्ञाननिष्ठ सुधार” पर लिखा। कहा – “जेल की दीवारें शरीर रोक सकती हैं, विचार नहीं।”
सामाजिक क्रांति- रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान 1924-1937: दलितों को मंदिर प्रवेश, सहभोज, जाति-पाति तोड़ना, शुद्धि आंदोलन। कहा – “छुआछूत मिटाओ, नहीं तो हिंदू समाज मिट जाएगा।” पतित पावन मंदिर बनवाया जहाँ सब जा सकते थे। सावरकर के 3 बड़े विचार – आज भी प्रासंगिक

हिंदुत्व” क्या है: सावरकर के लिए हिंदू – भारत को पितृभूमि + पुण्यभूमि मानने वाला हर व्यक्ति। ये “पूजा पद्धति” नहीं, “राष्ट्रीय पहचान” है। सिख, जैन, बौद्ध सब इसमें शामिल।

विज्ञान और तर्क : “गाय उपयोगी पशु है, पूज्य नहीं। उसकी रक्षा करो पर पूजा के नाम पर अवैज्ञानिक बात मत फैलाओ।” जाति, कुरीति, अंधविश्वास के खिलाफ खुलकर लिखे।

सैनिकीकरण – “राजनीति का हिंदुकरण हो और हिंदुओं का सैनिकीकरण हो।” कमजोर कौम आजाद नहीं रहती। इसलिए हर युवा को सैनिक शिक्षा जरूरी मानी।

विवाद और आलोचना – दोनों पहलू

इतिहास में कोई भी व्यक्तित्व एकरंगा नहीं होता। सावरकर पर भी सवाल उठे:

समर्थक कहते हैं –
27 साल जेल-नजरबंदी काटी। 2 बार काला पानी – दुनिया में मिसाल नहीं।
1857 को “स्वतंत्रता संग्राम” का दर्जा दिलाया।
दलितोद्धार, महिला शिक्षा, समुद्र-लंघन का समर्थन – समय से बहुत आगे थे।

आलोचक कहते हैं –
1920 के बाद गांधी के अहिंसा मार्ग से मतभेद।
सेल्युलर जेल से लिखे “माफीनामे” पर बहस। सावरकर ने कहा – “ये रणनीति थी बाहर आकर काम करने की।”
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर वैचारिक मतभेद।

इतिहास का नजरिया- गांधी, भगत सिंह, सुभाष, अंबेडकर – सबके रास्ते अलग थे पर मंजिल एक: आजादी। सावरकर उस लड़ाई का “उग्र, बौद्धिक और सामाजिक” मोर्चा थे।

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