जहानाबाद- मगध साहित्य विरासत मंच’ ‘वाणावर काव्य महोत्सव’ का भव्य आयोजन!

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पंकज कुमार जहानाबाद।

मगध की पावन धरती अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। इसी गौरवशाली परंपरा को अक्षुण्ण रखने और जनमानस को अपनी जड़ों से जोड़ने के ध्येय के साथ ‘मगध साहित्य विरासत मंच’ द्वारा रविवार, 18 जनवरी 2026 को ‘वाणावर काव्य महोत्सव–06’ का भव्य आयोजन किया गया। जहानाबाद के मखदुमपुर स्थित बराबर की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित लामा होटल में आयोजित इस कार्यक्रम ने साहित्य और संस्कृति के एक नए युग का सूत्रपात किया है। यह आयोजन मगध की साहित्यिक चेतना को विस्तार देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ है, जहाँ प्रकृति के सानिध्य में शब्दों की अनूठी महफिल सजी।
यह महोत्सव केवल कविता पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे साहित्य, इतिहास, पर्यटन और प्रकृति के अनूठे संगम के रूप में प्रस्तुत किया गया। मगध साहित्य विरासत मंच के संरक्षक और मुख्य संयोजक अशोक कुमार ‘प्रियदर्शी’ तथा सागर आनंद के नेतृत्व में पिछले छह वर्षों से यह सिलसिला निरंतर जारी है। इन छह वर्षों में वाणावर काव्य महोत्सव ने न केवल स्थानीय स्तर पर पहचान बनाई है, बल्कि आज इसकी गूँज पूरे देश में सुनाई दे रही है। आयोजकों का संकल्प है कि मगध की इस प्राचीन सभ्यता को साहित्य की चाशनी में भिगोकर दुनिया के सामने लाया जाए, ताकि नई पीढ़ी अपने स्वर्णिम अतीत पर गर्व कर सके।
महोत्सव की गरिमा को बढ़ाने में संरक्षक मंडल की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही। पत्रकार संतोष श्रीवास्तव ने कार्यक्रम को अपनी शुभकामनाएँ देते हुए इसे वैचारिक क्रांति का प्रतीक बताया। वहीं, मानस के निदेशक चंद्रभूषण शर्मा (भोला बाबू) ने अपने संबोधन में कहा कि इस तरह के आयोजनों से समाज को नई दिशा और युवाओं को जबरदस्त मोटिवेशन मिलता है। कायनात इंटरनेशनल के निदेशक शकील अहमद काकवी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई और मगध की साझी संस्कृति को बढ़ावा देने के मंच के प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
इस साहित्यिक महाकुंभ में पर्यटन की संभावनाओं पर भी गंभीर विमर्श किया गया। संरक्षक मंडल में शामिल सुनील प्रसाद और कुमारी सुमन सिद्धार्थ ने पर्यटन के दृष्टिकोण से वाणावर की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि बराबर की पहाड़ियाँ केवल पत्थरों का समूह नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सभ्यता की गवाह हैं। प्रसिद्ध दंत चिकित्सक डॉ. रोहित राज और व्यवसायी नीतीश प्रेम ने भी इस मंच को एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर बताया, जो पर्यटन और साहित्य के माध्यम से जहानाबाद के विकास का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
कार्यक्रम का मुख्य केंद्र बिंदु ‘वाणावर’ (बराबर) की वे ऐतिहासिक गुफाएं रहीं, जिन्हें ‘सतघरवा’ के नाम से जाना जाता है। इतिहास गवाह है कि ये गुफाएं विश्व की पहली मानव निर्मित गुफाएं हैं, जिनका निर्माण मौर्य काल में हुआ था। इन गुफाओं की वास्तुकला और उनके भीतर की चमक आज भी वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है। महोत्सव के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि यदि इन गुफाओं का उचित प्रचार-प्रसार हो, तो यह क्षेत्र वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से उभर सकता है।
साहित्यिक सत्र में बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर की महिमा का भी गुणगान किया गया। पहाड़ियों की चोटी पर स्थित यह प्राचीन मंदिर मगध के लोगों की अगाध आस्था का केंद्र है। कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सिद्धेश्वर नाथ की आध्यात्मिक शक्ति और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का सजीव चित्रण किया। आयोजकों का मानना है कि जब तक पर्यटन स्थलों को साहित्य और स्थानीय लोकगाथाओं से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक उनका वास्तविक विकास संभव नहीं है। यही कारण है कि मंच विगत छह वर्षों से लगातार इस दिशा में संघर्षरत है।
काव्य सत्र की शुरुआत प्रसिद्ध गायक अवनीश कुमार मुन्ना की सुरीली प्रस्तुति से हुई, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद देश और राज्य के कोने-कोने से आए 101 कवि और कवियत्रियों ने अपनी लेखनी से वाणावर की वादियों को गुंजायमान कर दिया। मंच का कुशल संचालन राणा बीरेंद्र सिंह ने अपनी विशिष्ट शैली में किया, जिससे कार्यक्रम की निरंतरता और उत्साह अंत तक बना रहा। कवियों ने अपनी कविताओं में मगध के शौर्य, प्रेम और यहाँ की मिट्टी की खुशबू को बेहद खूबसूरती से पिरोया।
प्रमुख कवियों में डॉ. विभा रानी श्रीवास्तव, आरपी घायल, सुनील कुमार और भुवन ने अपनी कालजयी रचनाएं प्रस्तुत कीं। वहीं, इरशाद आलम शिबू, अंकित राज, अविनाश बंधु, मधुरेश नारायण और अटल लाल कर्ण ने समकालीन विषयों के साथ-साथ बराबर की ऐतिहासिकता पर प्रहार किया। विशेष रूप से प्रसिद्ध शायरा मीनाक्षी मीनल की उपस्थिति ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों ने प्रेम और सौहार्द का ऐसा वातावरण निर्मित किया कि दर्शक दीर्घा में बैठे लोग भावविभोर हो उठे।
महोत्सव के दौरान इस बात पर गहन चर्चा हुई कि आधुनिकता की दौड़ में युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक पहचान खोती जा रही है। अशोक कुमार ‘प्रियदर्शी’ ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि साहित्य ही वह माध्यम है जो अतीत के गौरव और भविष्य की संभावनाओं के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करता है। उन्होंने बताया कि यह महोत्सव अब महज एक वार्षिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह मगध की अस्मिता को बचाने का एक सशक्त जन-आंदोलन बन चुका है, जिसमें हर वर्ग का सहयोग मिल रहा है।
संरक्षक सागर आनंद और चितंजन चैनपुरा ने कार्यक्रम के आयोजन में अहम भूमिका निभाई। उनके साथ नंदन मिश्र, निशांत और अमृतेश कुमार मिश्रा ने पूरी निष्ठा के साथ व्यवस्थाओं को संभाला। मंच के इन सदस्यों का मानना है कि जहानाबाद को केवल अपराध या पिछड़ेपन के नाम से नहीं, बल्कि इसकी महान बौद्ध विरासत और अशोक कालीन गुफाओं के नाम से पहचाना जाना चाहिए। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘मगध साहित्य विरासत मंच’ दिन-रात काम कर रहा है और आज इसका प्रभाव धरातल पर दिखने लगा है।
बराबर की पहाड़ियों में स्थित पाताल गंगा के निकट का यह आयोजन स्थल अपने आप में शांति और सुकून का प्रतीक रहा। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने कवियों को नई कल्पनाएं उड़ान देने के लिए प्रेरित किया। वक्ताओं ने सरकार और स्थानीय प्रशासन से मांग की कि बराबर की इन पहाड़ियों को ‘विश्व धरोहर’ की सूची में शामिल कराने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं। यहाँ बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और बेहतर कनेक्टिविटी से विदेशी पर्यटकों की संख्या में भारी इजाफा हो सकता है।
आयोजन की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में छात्र, शिक्षक और बुद्धिजीवी भी शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में स्वीकार किया कि छह साल पहले शुरू हुआ यह छोटा सा प्रयास आज एक वटवृक्ष बन चुका है। पर्यटन और साहित्यिक उत्थान के लिए किया गया यह प्रयास पूरे बिहार में अपनी तरह का अनोखा कार्यक्रम है, जिसका इंतजार लोग साल भर बड़ी बेसब्री से करते हैं।
महोत्सव के अंत में उन सभी कवियों और सहयोगियों को सम्मानित किया गया जिन्होंने इस यात्रा को सफल बनाने में अपना योगदान दिया है। आयोजकों ने बताया कि अगले वर्ष का आयोजन और भी भव्य होगा, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों को आमंत्रित करने की योजना है। इस छठा संस्करण ने यह साबित कर दिया कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो साहित्य के माध्यम से किसी भी क्षेत्र की तकदीर और तस्वीर बदली जा सकती है।
समापन सत्र में आभार व्यक्त करते हुए आयोजकों ने स्थानीय नागरिक समाज और प्रशासन के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने कहा कि मगध की यह सांस्कृतिक मशाल अब बुझने वाली नहीं है। यह महोत्सव आने वाले समय में जहानाबाद के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ेगा, जिसे इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। सभी आगंतुकों ने संकल्प लिया कि वे अपने स्तर पर वाणावर की विरासत का प्रचार करेंगे।
कुल मिलाकर, वाणावर काव्य महोत्सव–06 ने साहित्य, संस्कृति और पर्यटन के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। यह आयोजन मगध की माटी के प्रति प्रेम और गौरव का प्रतीक बन गया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही ‘सतघरवा’ की गुफाएं और बाबा सिद्धेश्वर नाथ की यह नगरी विश्व पर्यटन के मानचित्र पर अपनी सही जगह पाएगी, जिससे इस क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को नई गति मिलेगी।

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