महाशिवरात्रि विशेष :- रत्नेश्वर नाथ महादेव मंदिर बाबाधाम एवं बासुकीनाथ से मिलता है स्वरूप!

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रिपोर्ट- संतोष तिवारी!

शिवलिंग पर चढ़े बेलपत्र खाने से कुष्ठ रोगों से मिलती है मुक्ति ।

रत्नेश्वर नाथ महादेव मंदिर बाबाधाम एवं बासुकीनाथ से मिलता है स्वरूप

महाशिवरात्रि में भव्य मेले का होता है आयोजन ।

महाशिवरात्रि को लेकर तारापुर के रत्नेश्वर नाथ महादेव शिव मंदिर को शिव पार्वती के विवाह की तैयारी करवाने को लेकर लगभग पुरी तैयारी कर ली गई है।
मंदिर को रंग रोगन करवाकर दुल्हन की तरह सजाने का कार्य मंदिर समिति के सदस्यों द्वारा किया जा रहा है।मंदिर को आकर्षक बनाने के लिए मिनी लाइट का झालर लगाया जा रहा है।सभी शिव मंदिर का कुछ न कुछ विशेष मान्यता है।

मंदिर का इतिहास

मुंगेर जिला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूरी पर अवस्थित रणगांव स्थित श्रीश्री 108 बाबा रत्नेश्वर मंदिर अति प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है।बाबा रत्नेश्वर के बारे में धारणा है कि बाबा की अराधाना करने वालों को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि सालों भर दो चार कुष्ठ रोगी बाबा रत्नेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना करते देखे जाते हैं।

मंदिर के स्थापना के संबंध में कुछ वैचारिक मतभेद हैं। कुछेक लोगों का कहना है कि यह मंदिर पाल कालीन है। ऐसे लोग तर्क देते हैं कि मंदिर के शिला पर कई जगह कुछ चीजें लिखी हुई है। सभी लिखावट पाली भाषा में है।वहीं कुछ लोगों का कहना है कि रणगाँव मंदिर का शिव लिंग अंकुरित है। बहुत पहले रति नामक किसान हल से खेत की जुताई कर रहा था। अचानक हल शिला में अड़ गया एवं शिला से रक्तश्राव होने लगा। रक्तश्राव होते देख किसान डर गया।उसने इसकी सूचना ग्रामीणों व साधु संतों को दी।संतों की मौजूदगी में खुदाई कराई गई,तो बड़ा शिवलिंग जमीन के निचे समय निकला। आज भी शिवलिंग में हल से कटे का निशान है।रति किसान को लोग रत्नेश्वर कह कर बुलाते थे।उन्हीं के नाम पर रत्नेश्वर महादेव का नामांकरण कर दिया गया।वहीं मंदिर के संबंध में एक कथा यह भी प्रचलित है कि इस स्थल पर राजा खदेडीया का मुगलों के साथ युद्ध हुआ था।जिसमें मुगल पराजित हो गए थे।राजा खदेडिया ने जीत की खुशी में हिजरी सन 1203 में मंदिर का भव्य निर्माण करवाया।इसमें लगे पत्थर वहीं हैं, जो बाबाधाम स्थित बाबा रावणेश्वर महादेव मंदिर का है। शिल्पकला भी मिलता जुलता है।
श्री श्री 108 बाबा रत्नेश्वरनाथ मंदिर की आकृति एवं प्रांगण का स्वरूप बाबाधाम एवं बासुकीनाथ से मिलता जुलता है। इसी कारण लोग बाबा रत्नेश्वर मंदिर को सिद्धपीठ मानते हैं। बाबा रत्नेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं को कुष्ट जैसे आसाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि यहां सालों भर दो चार कुष्ट रोगी बाबा की पूजा अर्चना करते दिख जाते हैं।मंदिर के उत्तर एक शिवगंगा है जहां श्रद्धालु स्नान करने के बाद मंदिर में पूजन करते हैं। यह भारत का ऐसा एकमात्र मंदिर है जिसके पुरोहित ब्राह्मण नहीं बल्कि राजा की दी हुई व्यवस्था के तहत बरैय जाति के लोग पंडा कहलाते हैं एवं समस्त पूजन कार्य करवाते हैं। भागलपुर जिला निवासी लखनपुर के कायस्थ जाति उस वक्त राजा के दीवान हुआ करते थे। राजा ने उन्हें जिम्मेवारी दी थी कि शिवरात्रि के समय वे लखनपुर से बाबा रत्नेश्वरनाथ का बारात लाएंगे। जिसका पालन अभी भी कायस्थ परिवार के द्वारा किया जा रहा है। अब अन्य लोग भी बारात में शामिल होने लगे हैं। मंदिर समिति के पुजारी भवेश पंडा पूर्व मुखिया सह ग्रामीण अंबिका पंडा,नितिन वर्मा निरंजन पंडा अजय झा, आदि ने कहा कि मंदिर की व्यवस्था का संचालन धार्मिक न्यास परिषद द्वारा गठित समिति करती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर पहले यहां एक माह का मेला लगता है।वहीं सावन माह में भी प्रत्येक दिन यहां विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

प्रत्येक सोमवार को होती है श्रृंगार पूजा।

बाबा रत्नेश्वर के बारे में बाबा पर आस्था रखने वाले भक्तजनों का मानना है कि बाबा का सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने से सारे कष्टों का निवारण होता है।बाबा के दरबार में पूजा करने के लिए रोज भक्तों का तांता लगा रहता है।सोमवार को विशेष पूजा करने को लेकर मंदिर में भक्तों की भीड़ भारी तादाद में होता ती है।प्रतिदिन संध्या में भी भक्तों का सैलाब मंदिर परिसर में संध्या आरती करने को लेकर उमड़ी रहती है। महाशिवरात्रि में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है बड़ी धूम-धाम से भगवान शिव माता पार्वती का विवाह कराया जाता है साथ ही भव्य मेला का आयोजन भी होता है ।

बाइट -अंबिका पंडा
बाइट -नितिन वर्मा
बाइट-निरंजन पंडा

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