सुहागिनों ने वट वृक्ष की पूजा कर सुनी सावित्री और सत्यवान की कथा!

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रिपोर्टर — राजीव कुमार झा

अखंड सुहाग की कामना से हुई वट सावित्री पूजा

सात बार वटवृक्ष की परिक्रमा कर पूजा की, पवित्र धागा बांधा

ऐंकर– मधुबनी जिले भर में सहर से लेकर गांवों तक सुहागिनों ने बरे ही निष्ठा के साथ की बट सावित्री पूजा। जिले भर में गुरुवार को वट सावित्री पूजा काफी धूम धाम के साथ मनाई गई। महिलाएं सुबह से ही चौंक-चौराहों पर वट वृक्ष (यानि कि बरगद पेड़) की पूजा करने के लिए वृक्ष के पास पहुंचने लगी थी। जगह जगह महिलाएं सज धज कर वट वृक्ष की पूजा करते दिखाई दी। इस त्योहार के संबंध में बताया जाता है कि महिलाएं त्योहार के एक दिन पहले दिन में उपवास रखकर रात में अरवा भोजन बनाकर खाती हैं, फिर वट सावित्री पूजा के दिन वट वृक्ष की पूजा कर अपने अमर सुहाग के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं। वही हरलाखी प्रखंड क्षेत्र के गिरजा स्थान मंदिर फुलहर, कलना, सहित दर्जनों गांवों में वट सावित्री की पूजा का मनोरम दृश्य देखते ही बन रहा था। सुहाग की रक्षा के लिए वट-सावित्री पर्व सहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। विवाहित महिलाएं अपने पति की रक्षा एवं संतान की प्राप्ति के लिए नए वस्त्र धारण कर बांस का बना पंखा ( बेन ) पांच प्रकार का पकवान, मौसमी फल, धूप अगरबत्ती, सिन्दूर, फुल, पान, मीठाई एवं अक्षत लेकर सुबह से ही पूजा-अर्चना करते नजर आयी। जितना पुराना पेड़ होगा उतनी अधिक पति की आयु बढ़ेगी। इसी धारणा के साथ इस पर्व को सुहागिनों के द्वारा मनाए जाने का परम्परा है। वहीं पहली बार पर्व को मना रही नव विवाहिताओं में तो काफी उत्साह देखा गया। ये नव विवाहिता इस दौरान काफी खुश नजर आ रही थी। वहीं वर्षों से वट सावित्री पर्व मनाती आ रही महिलाओं ने भी पुरे श्रध्दा के साथ पति के लम्बे उम्र की कामना के साथ पर्व को मनाती दिखाई दी। ऐसे सुहागिनों ने बताया कि भगवान से यही प्रार्थना है कि बरगद के पेड़ के समान पति की आयु में भी अनवरत विस्तार हो। पूजा-अर्चना के बाद व्रती महिलाओं द्वारा अपने पति के चरण को धोकर अपने सर पर पानी लेने की भी परंपरा है। फिर सुहागिनों अपने पति को पंखा झेलती है। फिर अपने हाथों से पति को प्रसाद ग्रहण करवाने के बाद खुद प्रसाद ग्रहण कर पूजा को समाप्त करती है। इस पर्व से भारतीय नारी की पतिब्रता होने की पहचान अनुकरणीय है।

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