✍️ पंकज का पंच!

उत्तर प्रदेश सियासत में ब्राह्मण वोटर को रिझाने का दांव शुरू!
2007 में मायावती ,2012 में अखिलेश ,और 2017 में योगी सत्ता तक पहुंची इन वोटरों की बदौलत!
उत्तर प्रदेश 2022 चुनाव का आगाज हो चुका है। भले ही चुनाव की तारीख तय नहीं की गई हो लेकिन यूपी में सियासत के अलग-अलग रंग चढ़ने लगा है। बासपा के सुप्रीमो मायावती 23 जुलाई से 29 जुलाई तक ब्राह्मण सम्मेलन करवा रही है। तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव परशुराम की मूर्ति स्थापित करवा रहे हैं। अलग-अलग इन पार्टी की कोशिशों के बीच सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने भी पूरी ताकत झोंक दी है कि यह वोटर उनके पाले से ना खिसक पाए।
माना जाता है कि यह परंपरागत भाजपा की बोटर है और इस बार नाराज चल रहे हैं। अब यहां पर समझना जरूरी होता है। कि इस वोटर की उत्तर प्रदेश राजनीति में इतनी अहमियत क्यों है।
दरअसल यूपी की सियासत में ब्राह्मणों का अच्छा पकड़ है आजादी के बाद से 1989 तक यहां आधे दर्जन ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने लेकिन 1990 के बाद यूपी को कोई ब्राह्मण चेहरा नहीं मिला। विश्लेषक बताते हैं कि इसकी मूल वजह रही कि यूपी की राजनीति में मुस्लिम और एससी वोटरों पर केंद्रित हो गई। लेकिन वर्ष 2007 में मायावती ने फिर से एक बार इन पर दांव खेला तो मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी। 41 ब्राह्मण विधायक चुने गए। बस क्या था सभी पार्टी ने यह प्रयोग शुरू किया अगली सरकार समाजवादी पार्टी की बनी तो ब्राह्मण विधायकों की संख्या 21, लेकिन 2017 में इन वोटरों ने फिर करवट लिया और सत्तासीन तक योगी को पहुंचाया। जहां कुल ब्राह्मण विधायक की संख्या 46, यानी 3 विधानसभा चुनाव का ट्रेंड देखे तो जिस राजनीतिक दल के पास ब्राह्मण विधायक सबसे ज्यादा था सरकार उसी की बनी। यूपी में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब 13% है। उत्तर प्रदेश के कई ऐसे जिला है जहां यह सीधे प्रभाव डालते हैं। लिहाजा अभी से सभी दल जोड़-तोड़ की राजनीति में इन्हें साधने को लगे हैं। हालांकि यह कभी कांग्रेस के परंपरागत वोटर हुआ करते थे। फिर यह वोटर ऐसा खिसका,
कांग्रेस तीन दशक से सत्ता से दूर है खैर अब यह देखना लाजिमी होगा कि आखिर ऊंट बैठेगा किस करवट।




