रिपोर्ट :- अमित कुमार
सीतामढ़ी :- छठ पर्व के बाद गांव में लोकपर्व सामा-चकेवा के गीत गूंजने लगे हैं। कार्तिक पूर्णिमा तक प्रत्येक दिन शाम ढ़लते ही घरों की महिलाएं सामा चकेवा की गीत गाती हैं। उसी दिन खेत में विसर्जित किया जाता है। रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह सामा चकेवा भी भाई बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक पर्व है। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ही उम्रदराज महिला साथ-साथ इसे उल्लास से मनाती है। इस पर्व की खास बात यह है कि जहां बहनें अपने भाई के दीर्घ आयु की कामना करती है। वहीं इसके गीत पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है। लोकपर्व सामा-चकेवा का उल्लेख पद्म पुराण में भी है। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्री सामा और पुत्र साम्ब के पवित्र प्रेम पर आधारित है। चुड़क नामक एक चुगलबाज ने एक बार श्रीकृष्ण से यह चुगली कर दी कि उनकी पुत्री साम्बवती वृंदावन जाने के क्रम में एक ऋषि के संग प्रेमालाप कर रही थी। क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्री और उस ऋषि को शाप देकर मैना बना दिया। साम्बवती के वियोग में उसका पति चक्रवाक भी मैना बन गया। यह सब जानने के बाद साम्बवती के भाई साम्ब ने घोर तपस्या कर श्रीकृष्ण को प्रसन्न किया और अपने बहन और जीजा को श्राप से मुक्त कराया। तबसे ही मिथिला में सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है।




