त्वरित टिप्पणी: जनता समझ रही है मुजफ्फपुर के मेयर की कुर्सी के लिए खामोशी से चलने वाली खेल को..!

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(आलेख- संतोष तिवारी)


खामोशियों के आगोश में मतदाताओं को लपेटने की तैयारी में आ गए है नगर निगम के चुनाव में उतरे हुए प्रत्याशी।

भोजपुरिया में एक कहावत है- ”सियारा वही है,जो दोम रंगवले है !” जी हाँ ! यह कहावत बिल्कुल सटीक व फिट बैठ रहा है ! खास कर मुजफ्फरपुर नगर निगम 2022 के चुनाव में ।

जातीय समीकरण के बिसात पर मोहरे बिछाए जा रहे हैं! जिसके मोहरे जितनी चालाकी से बिछायी जाएगी उतने ही ख़ामोशी के आगोश में भोली भाली मतदाता लपेटे जा सकेंगे , जो सबसे ज्यादा लोगों को लपेट पाएंगे वही मेयर की कुर्सी पर विराजमान होगें।

अभी तक जितने भी जन प्रतिनिधि को चुनकर जनता ने नगर निगम में चुनकर भेजा सभी एक विकाऊ वस्तु बनकर राजीनीति के सौदागरो के दलालों के हाथों बिकते गए । इतने बिके की बीते पाँच सालों में सबके बिकने की चर्चा सरेआम चुनावी बाजार में होती रही। सभी मातादाताओं के जेहन में उबाल मार रहा है । कोई दो बार बिका था, तो कोई तीन बार बिका था, कोई कोई तो इतना बिका की मातादाताओं से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं रही उसकी…!, पर बेचारे नेता जी करें तो क्या करें !चुनाव जो ठहरा ! बेशर्मी की हदे पार कर जनता के बीच जाना तो पड़ ही रहा है! जनता पूछ रही है की आप इतने सारे जनप्रतिनिधियों ने मिलकर मुजफ्फरपुर नगर निगम क्षेत्र में एक मच्छर का बाल बांका नहीं कर पाए तो अब क्या कर लेंगे..?

यह मतदाताओं का सवाल सुनकर नेता जी की अक्ल गायब हो जा रही है, नेता जी सोच में पड़ गए हैं कि यह तो इतने भोले भाले मतदाता थे की पिछले चुनाव में हमने तो ख़ामोशी के कफ़न में इन्हें लपेट दिया था। इस बार कौन सा बुस्टर डोज ले लिया है की इतना टेढ़ा सवाल कर रहा है। नेता जी सोच ही रहे है कि नेता जी के इस सोच को भोली भाली मतदाता समझ रही है और इस बार इस चुनावी जंग में जो प्रत्याशी जनता को ख़ामोशी के कफ़न में लपेटने की तैयारी में है जनता उन्हें खामोशियों के कफ़न में लपेटने के लिए मन बना लिया है।

इसका भय नेता जी को अंदर ही अंदर सताने लगा है और किंग मेकर की भूमिका निभाने वाले को मतदाता बताने लगा है कि असली मालिक कौन है..?

जनता आँखे दिखाने लगा है अब तक जो हुई थी मतदान करने में भूल, उसे है सुधारने की जरूरत!

जनता पूछ रही है अब बताओ नेता जी किस झाड़ू से चढ़ाऊ आपको फूल..? यह सुनकर नेता जी भागने लगे है चुनावी मैदान से बरबाराते हुए … नहीं चढ़वाना है झाड़ू वाला फूल,/ कुल रहो मतदाता भाइयो कुल! /अब तो गर्मी भी जाने वाली है इसी लिए मतदाता भाइयो तुम रहो कुल!/ इस चुनाव में नहीं करना है अब कोई भूल ! ताकि कोई पाँच साल तक हमारे अधिकारों को ना करेखामोशियों दफन! कर जाये उसे जाओ भूल/ अपने वोट के अधिकारों को पहचानो, वोट के सौदागरो को पहचानो, वोट के दलालों को पहचानो नगर निगम के दलालों को पहचानो, अबकी बार नहीं पहचानोगे तो फिर पहले के जैसा पछताओगे।

फिर इसी शहर की सड़को मिलेगा आवारा कुत्तो का आतंक, सारांध मारती कचरों के अंबार का दुर्गन्ध , शहर की सभी सड़कें, गलियां जाम में फंसे छोटे छोटे स्कूली रोते मासूम बच्चो की चीख, जाम में फंसे एम्बुलेंस की की आवाज़! जो चिरती हुई आपके दिलो दिमाग़ को हिला देने वाली खबरें, हर तरफ झील सा नजारा, शहरवासियो पर चलेगा टैक्स का फब्बारा। शहरवासियो को डेंगू जैसे गंभीर बीमारियों को देने वाला मच्छरो के झुंड का हमला। और जितने वाले अपनी तिजोरी भरते दिखेंगे, अगर इस लेख पर भरोसा नहीं तो चुनाव शब्द का संधि विच्छेद करके देखो चुना + आव = चुनाव मतलब फिर चुना लगाने आवो, जय हो चुनाव जय हो चुनाव जय हो चुनाव,,

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