जिन्होंने बांका की तस्वीर, और राजनीति की तकदीर को बदल दिया था।

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(पुण्यतथि पर विशेष स्वर्गीय दिग्विजय सिंह)

कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर:-

स्वर्गीय दिग्विजय सिंह जिन्होंने राजनीति की परिभाषा को ही बदल दिया था। चलिए हम याद दिलाते हैं आपको वह दौर जब जदयू पर शरद और नीतीश की गुट लगातार पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे थे। इसी बीच लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, जॉर्ज फर्नाडिस भूलने की बीमारी से ग्रसित होने लगे थे। इस बीच जदयू ने उन्हें टिकट से मरहूम कर दिया ‌ स्वर्गीय दिग्विजय सिंह राज्यसभा के सदस्य झारखंड से हुआ करते थे। और उन्हें भी लोकसभा के टिकट से वंचित कर दिया गया। जिसके बाद उन्होंने राज्यसभा सदस्य से इस्तीफा दे दिया‌ और निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया बांका लोकसभा से निर्दलीय उम्मीदवार दिग्विजय सिंह को नगाड़ा छाप चुनाव चिन्ह मिला। पूरे क्षेत्र में दद्दा के नाम से मशहूर जनता ने अपने दद्दा को उस सर आंखों पर बिठा लिया, जिसकी झनक बिहार की राजधानी पटना तक पहुंच गई। जमकर नगाड़ा बजा। और सूबे के मुखिया की कुर्सी हिल गई।
दिग्विजय सिंह का जन्म 14 नवंबर 1955 को बिहार के एक राज् परिवार में सुरेंद्र सिंह के घर हुआ था और वह मां-बाप के इकलौते पुत्र थे। उन्होंने अपनी शिक्षा दीक्षा की सफर बिहार से लेकर जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय तक पूर्ण की।

राजनीति सफर

उन्होंने अपनी राजनीति की सफर शुरुआत दिल्ली के जेएनयू से शुरू किया और 1990 में राज्यसभा पहुंच गए जिसके बाद 90,91 के दौर में वह मंत्री रहे। महज 55 साल की उम्र में तीन बार लोकसभा सदस्य, पांच बार संसद सदस्य, हालांकि अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में भी वह मंत्री रहे। कई राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि अगर दिग्विजय सिंह वर्तमान समय में जीवित रहते तो बिहार की राजनीति की दिशा और दशा कुछ और होती।

जिंदा दिल ,खुश मिजाज, एक आम इंसान

कई बार लोकसभा और विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान समय हमने उनके साथ बिताया। एक अलग सी ललक होती थी जनता में उनसे मिलने की जनता के भी राजा एक सरल स्वभाव व सरल अंदाज और इसी सरल स्वभाव सरल अंदाज ने उनको नाम दिया दद्दा। और लोगों के जेहन में तैरने लगा यही असली राजा है हम लोगों का। तभी तो मुख्यमंत्री को खुला चैलेंज कर जदयू के लहर के बीच जमकर नगाड़ा बजा दिया जनता ने। लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था अचानक 24 जून 2010 को लंदन से एक मनहूस घड़ी में मनहूस खबर पहुंचती है।

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