कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर
कन्हैया घर चलू गुइया? आजु खेले होरी… होरी रे…।
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के आने से होली का रंग और रंगीन हो चुका था। पटना की तमाम गलियां, सड़क, चौक आदि होली के दिन एक अणे मार्ग की ओर अनायास ही घूम जाते थे। जिस प्रकार वृंदावन में होली खेलने गोपियां कृष्ण के घर जाया करती थीं, उसी प्रकार पटना के लौंडे होली के दिन लालू का जोगीरा सुनने और उनके रंग में रंगने के लिए मुख्यमंत्री आवास की ओर रुख करते थे। वहां लालू के सिंह दरबार में इनका स्वागत स्वयं मुख्यमंत्री करते थे।
सच कहें तो होलिका दहन की आग पर हर साल राजनितिक खिचडिय़ां पका करती थीं और उस खिचड़ी का वर्चुअल मजा बीबीसी के माध्यम से पूरा देश लेता था। बड़े-बड़े नौकरशाह, आइएएस, आइपीएस, मंत्री-संतरी लालू की चरणवंदना में वहां हाजिर रहते थे। लालू प्रसाद जनता और कार्यकर्ता के सामने अपने जोगीरा के धुन पर उनका डांस कराकर सबका मनोरंजन… यूं कहिए मानसिक गुलामी का प्रदर्शन किया करते थे।
लेकिन ये क्या! 1995 में एक नौकरशाह ने ही लालू के रंग में भंग डाल दिया। लालू की हेकड़ी पर इस नौकरशाह के चाबुक का असर दिख रहा था। तिलमिला कर लालू ने उस नौकरशाह को भैंस की पीठ पर चढ़ाकर पूरे प्रदेश में घुमाने की घोषणा कर दी थी।
वह नौकरशाह कोई और नहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषण थे। 1990 में निर्वाचन आयुक्त बनने के बाद से ही शेषण के लिए बिहार चुनाव बड़ी चुनौती थी। बिहार चुनाव की कठिनता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि देश का पहला बूथ कैप्चरिंग बिहार के बेगूसराय जिले के मटिहानी स्थित रचियारी गांव में ही 1957 में हुआ था। राजनीतिक हिंसा बिहार चुनावों में एक आम बात थी। 1991 के चुनाव में गया से भाजपा प्रत्याशी ईश्वर चौधरी से लेकर कई नेता, कार्यकर्ता कालांतर में मौत के घाट उतारे जा चुके थे। लालू के शासन के दौरान राज्य प्रायोजित हिंसा (मूल रूप से सत्ताधारी जनता दल प्रायोजित) काफी बढ़ चुकी थी। प्रदेश में अपराध का ग्राफ अपने चरम पर था। आनंद मोहन, पप्पू यादव, छोटन शुक्ला, प्रभुनाथ सिंह, अशोक सम्राट, हेमंत शाही आदि का खौफ हर जगह दिखता था। आप सोच सकते हैं कि अनंत सिंह, शहाबुद्दीन इत्यादि उन दिनों गिनती में भी नहीं आते थे। ऐसे में बिहार में स्वच्छ चुनाव कराना नामुमकिन के सामान था।
शेषण ने इस नामुमकिन को मुमकिन करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने घोषणा कर दी कि 1995 का चुनाव में मतदाता पहचान पत्र के बिना बिहार में संभव नहीं हो पाएगा। दरअसल मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत साल 1993 के उत्तर प्रदेश चुनावों से पूर्व की कर दी गई थी, किंतु पूर्ण रूपेण लागू नहीं की जा सकी थी। (पूर्णरूपेण अबतक भी लागू नहीं हो पाया है)। लालू प्रसाद यह सुनते ही सकते में आ गए और शेषण को अपने ठेठ अंदाज में भैंसिया की पीठिया पे लाद बिहार घुमाने का घोषणा कर दी।
कुल मिलाकर पूरे बिहार में जनवरी 1995 में युद्धस्तर पर फोटो पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। मेला-तमाशा की तरह बिहार में फोटो पहचान पत्र बनने लगा। इसी के साथ शेषण ने जनवरी में ही बिहार चुनावों के तारीखों की घोषणा कर दी। बिहार चुनावों की दुदुम्भी के बजते ही जनवरी की शीतलहरी में बिहार का राजनीतिक तापमान चढ़ गया…।
(अगले चक्र में जानेंगे, किस प्रकार चुनाव की तारीखें आगे बढ़ी और बिहार में पहले कामचलाऊ सरकार और फिर राष्ट्र पति शासन।




