बाबा गरीबनाथ धाम में नंदी महाराज की कैद: भक्तों की आस्था पर सवाल।

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रिपोर्ट – संतोष तिवारी

बिहार/मुजफ्फरपुर

बाबा गरीबनाथ धाम, जो शिव भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, इन दिनों विवादों में घिरा हुआ है। मंदिर के पुजारी, पंडित अभिषेक पाठक, ने नंदी महाराज को लोहे के पाइप से कैद करने के खिलाफ आवाज उठाई है। उनका कहना है कि यह न केवल भक्तों की आस्था से खिलवाड़ है, बल्कि यह एक धार्मिक परंपरा का उल्लंघन भी है।

हिंदू धर्म में नंदी भगवान का विशेष स्थान है। उन्हें भगवान शिव का वाहन और भक्तों की आवाज़ भगवान भोलेनाथ तक पहुँचाने वाला माना जाता है। मान्यता है कि भक्त अपने दुख-दर्द और इच्छाओं को नंदी के कान में बुनते हैं, जो उन्हें भगवान शिव तक पहुँचाते हैं। लेकिन, अब जिस तरह से नंदी को कैद किया गया है, उससे भक्तों को अपनी बात कहने में कठिनाई हो रही है। पंडित पाठक ने कहा, “नंदी के कान बंद तो भक्तों की बात कहां जाएगी?”

पंडित अभिषेक पाठक ने मंदिर न्यास समिति को चार दिन का अल्टीमेटम दिया है कि वे नंदी को जल्द से जल्द कैद से मुक्त करें। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांग पूरी नहीं की गई, तो वे स्वयं नंदी को कैद से आजाद कराने का कदम उठाएंगे। यह स्थिति उन भक्तों के लिए चिंता का विषय है, जो बाबा गरीबनाथ के प्रति अपनी गहरी आस्था रखते हैं।

पंडित पाठक ने यह भी बताया कि केवल नंदी की कैद ही समस्या नहीं है, बल्कि मंदिर की व्यवस्था भी चरमरा गई है। भक्तों की बढ़ती संख्या के बावजूद, मंदिर प्रबंधन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। उन्होंने न्यास समिति से अनुरोध किया है कि वे मंदिर की अव्यवस्थाओं को ठीक करें, ताकि आने वाले शिव भक्तों की आस्था को ठेस न पहुंचे।

इस मुद्दे पर भक्तों की प्रतिक्रिया भी आ रही है। कई भक्तों ने पुजारी के साथ सहमति जताई है और कहा है कि नंदी की कैद से उनकी आस्था को चोट पहुँची है। उनका मानना है कि नंदी को कैद करने का यह कदम न केवल गलत है, बल्कि यह शिव भक्ति की भावना के विपरीत है। भक्तों का कहना है कि अगर नंदी की स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो वे मंदिर आने से कतराएंगे।

बाबा गरीबनाथ धाम में नंदी महाराज की कैद का मामला अब एक बड़ा विवाद बन चुका है। यह न केवल भक्तों की आस्था के लिए चुनौती है, बल्कि धार्मिक परंपराओं के लिए भी एक गंभीर सवाल उठाता है। पुजारी पंडित अभिषेक पाठक की मांग और भक्तों की प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अगर मंदिर प्रबंधन समय रहते उचित कदम नहीं उठाता, तो यह निश्चित रूप से भक्तों के विश्वास को और भी गिराएगा।

आखिरकार, आध्यात्मिकता और आस्था का यह स्थान भक्तों के लिए एक आश्रय स्थल है, और इसे उसी तरह बनाए रखना अनिवार्य है।

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