राबड़ी देवी के बंगले का मामला, राजद का जोरदार हमला, कहा जो हाथ बांधे खड़े रहते थे वो जबरन खाली करा रहे!

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रिपोर्ट – अमित कुमार!

बिहार की राजनीति हमेशा से उतार-चढ़ाव से भरी रही है। अभी जो चर्चा सबसे तेज है वो राबड़ी देवी के सरकारी आवास को खाली कराने की कार्रवाई को लेकर है। राबड़ी देवी बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। 1997 से 2005 के बीच उन्होंने लगभग 8 साल तक प्रदेश का नेतृत्व किया। लालू प्रसाद यादव के पद से हटने के बाद उन्हें कमान मिली थी। उनके कार्यकाल और व्यक्तित्व पर विपक्षी हमेशा सवाल उठाते रहे, लेकिन समर्थकों का मानना है कि उन पर आज तक कोई सीधा भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगा।

अब जब वो नेता प्रतिपक्ष हैं, तो उनके सरकारी बंगले को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। बयान देने वाले रजत और सत्येंद्र कुणाल का कहना है कि फोर्स भेजकर जबरन घर खाली कराया जा रहा है। उनका तर्क है कि एक समय था जब राबड़ी देवी को “मां” का दर्जा दिया जाता था। तब तक वो बैठने को नहीं कहती थीं, तब तक सामने वाला खड़ा रहता था। आज वही लोग सम्राट चौधरी, अमित शाह और नरेंद्र मोदी को खुश करने के लिए उनके आवास के सामने से काफिला लेकर गुजर रहे हैं।

“शर्म आती है तो बंगला खाली कर दो, नजर नहीं पड़ेगी” – ये पंक्ति इस पूरे टकराव का सार है। इसका मतलब सीधा है कि अगर पुराने रिश्तों की इज्जत नहीं है, तो कम से कम उस जगह से दूर रहो जहां से वो गुजरती हैं। बच्चा-बच्चा जानता है कि राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद कैसे संभाला था। बिना किसी लंबी राजनीतिक पृष्ठभूमि के वो अचानक प्रदेश की कमान में आईं। उस समय इसे कई लोगों ने ताज्जुब से देखा, कईयों ने इसे लोकतंत्र की मजबूरी कहा। लेकिन 8 साल तक उन्होंने सरकार चलाई।

आज वही आवास विवाद का केंद्र बना है। सरकारी नियम कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री को एक तय समय तक ही सरकारी आवास मिलता है। उसके बाद उसे खाली करना होता है। प्रशासन का पक्ष यही होगा कि नियम सबके लिए बराबर हैं। लेकिन राजद नेताओं का पक्ष अलग है। उनका आरोप है कि ये नियम का पालन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिशोध है। उनका कहना है कि बिहार धीरे-धीरे लोकतंत्र से राजतंत्र की तरफ बढ़ रहा है। जहां विरोध की आवाज दबाने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल हो रहा है।

बिहार में सत्ता और विपक्ष के बीच की खींचतान नई नहीं है। लालू-राबड़ी युग के बाद नीतीश कुमार का लंबा शासन रहा। अब सम्राट चौधरी उप मुख्यमंत्री हैं और बीजेपी का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में पुराने किले को तोड़ना नए सत्ता समीकरण का हिस्सा माना जा रहा है। राबड़ी देवी का बंगला सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है। वो 90 के दशक की राजनीति की निशानी है। उस दौर की याद दिलाता है जब मंडल की राजनीति चरम पर थी और पिछड़ों की भागीदारी सत्ता में बढ़ी थी।

इसलिए इस आवास को खाली कराने को लोग सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं मान रहे। इसे प्रतीकात्मक लड़ाई भी मान रहे हैं। एक तरफ “सुशासन” का मॉडल है, दूसरी तरफ “सामाजिक न्याय” की विरासत। दोनों आमने-सामने हैं।

लोकतंत्र में नियम जरूरी हैं। बिना नियम के कोई व्यवस्था नहीं चल सकती। लेकिन नियम लागू करने का तरीका भी उतना ही जरूरी है। फोर्स भेजकर, मीडिया के सामने हथकड़ी दिखाकर अगर कोई काम किया जाए तो वो संदेश अलग जाता है। फिर वो कानूनी कार्रवाई कम और राजनीतिक दबाव ज्यादा लगती है।

रावड़ी देवी का ये प्रकरण बिहार की राजनीति का आईना है। यहां विचारधारा की लड़ाई अब सड़क से सदन और सदन से सरकारी आवास तक पहुंच गई है। जनता देख रही है कि आखिर इस लड़ाई का अंत कहां होगा। क्या नियम की जीत होगी या परंपरा की। फिलहाल तो बंगले की दीवारें गवाह बन रही हैं कि सत्ता आती-जाती है, लेकिन उसके निशान बहुत देर तक बाकी रहते हैं।

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