बिहारी लोक चेतना के सबसे बड़े प्रतीक थे बाबू वीर कुंवर सिंह।

SHARE:

आरा/आशुतोष पाण्डेय!


बिहारी लोक चेतना के सबसे बड़े प्रतीक थे बाबू वीर कुंवर सिंह। कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार के अंतर्गत पुरातत्व निदेशालय एवं स्नातकोत्तर इतिहास विभाग महाराजा कालेज आरा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र ने कहा कि
बाबू कुंवर सिंह अपराजेय थे और इसी अवस्था में वे शहीद भी हुए थे। प्रोफेसर मिश्र ने बताया कि भोजपुरी क्षेत्र के चार महानायकों में से एक कुंवर सिंह थे और उनसे पहले इस क्षेत्र में महर्षि विश्वामित्र हुए थे जिनसे पढ़ने भगवान राम एवं लक्ष्मण आये थे। दूसरे राजा भोज एवं तीसरे महानायक शेरशाह सूरी थे जिनके शासन व्यवस्था को सम्राट अकबर ने अपनाया था। प्रोफेसर मिश्र ने कहा कि अवधी भाषा में जो स्थान राम का है वही स्थान भोजपुरी भाषा के लिए स्थान बाबू कुंवर सिंह का है । इसलिए भोजपुरी , साहित्यों,गीतों एवं कहानियों को संकलित किया जाना आवश्यक है। प्रोफेसर मिश्र ने कहा कि संसार में महात्मा गांधीजी एवं नेपोलियन पर सबसे अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं तो भोजपुर क्षेत्र में सबसे अधिक कुंवर सिंह पर लिखी गई है जिसका असर संपूर्ण बिहार के जनमानस पर रहा है। पूर्णिया सहित संपूर्ण मिथिला में कबड्डी खेलने के समय बाबू कुंवर सिंह के आरा का उल्लेख लोग करते हैं। उनके कुल गुरु मधुबनी जिला के मंगरौनी गांव के भिखिया दत्त झा ने उनकी ख्याति को पूरे मिथिला में प्रसारित किया था। संगोष्ठी का शुभारंभ प्रोफेसर डा रत्नेश्वर मिश्र, प्रोफेसर डा नीरज सिंह, प्रोफेसर डा बलिराज ठाकुर, महाराजा कालेज के प्रधानाचार्य डा आलोक कुमार, बाबू वीर कुंवर सिंह स्मृति संग्रहालय, जगदीशपुर के प्रभारी डा शिव कुमार मिश्र, स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के अध्यक्ष डा नेयाज हुसैन, इसी विभाग के डा अरुण कुमार राय, प्रोफेसर चंचल कुमार पाण्डेय, राष्ट्रीय कुंवर सिंह वाहिनी के संयोजक धीरज कुमार सिंह , डा कमलेश सिंह आदि के द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इससे पूर्व अतिथियों को मिथिला पेंटिंग से युक्त अंगवस्त्र एवं प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के मुहर की प्रतिकीर्ति के रूप में स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। आगंतुकों का स्वागत प्रधानाचार्य डा आलोक कुमार ने किया। जबकि कार्यक्रम का संचालन एवं आगत अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन संग्रहालय प्रभारी डा शिव कुमार मिश्र ने किया।मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी एवं भोजपुरी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा नीरज सिंह ने बताया कि बाबू कुंवर सिंह पहले योद्धा थे जिनके विजय से संघर्ष शुरू हुआ तथा अंत भी विजय से ही हुआ। उनकी लोकतांत्रिक चेतना आज भी प्रासंगिक है। डा सिंह के अनुसार जो अपने आप को राष्ट्र को समर्पित करते हैं उन्हें संपूर्ण राष्ट्र याद करता है। सामाजिक सौहार्द उनका आज भी प्रासंगिक है। जैनों का बहुत बड़ा केंद्र आरा रहा है तो हिन्दू,मुसलमान, ईसाई, महिला,जैन सभी को वे सम्मान देते थे। स्त्री सशक्तिकरण का वे प्रतीक थे। सभी को साथ लेकर चलने, दयालुता, रचनात्मक एवं कल्याणकारी कार्य करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। विशिष्ट वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए जैन कालेज के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ बलिराज ठाकुर ने कहा कि तोप के सामने तलवार लेकर लड़ने वाले अद्भुत योद्धा थे कुंवर सिंह। उन्हें जगदीशपुर की हमेशा चिंता रहती थी। नैतिकता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। गंगा पार करते समय पहले सहयोगियों को पार करवाये फिर बाद में स्वयं पार किया था। महिला कालेज के प्रोफेसर एवं इतिहास संकलन समिति के संयोजक राजीव कुमार ने विस्तार से बाबू वीर कुंवर सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। महाराजा कालेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डा नेयाज हुसैन ने पीपीटी के माध्यम से आरा हाउस की ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कुंवर सिंह के विभिन्न युद्ध स्थलों का उल्लेख किया। कल्याणकारी कार्यों के उल्लेख करते हुए पानी की समस्या के समाधान करने हेतु किये गये कार्यों की चर्चा की। डा अरुण कुमार राय ने पीपीटी के माध्यम से बाबू वीर कुंवर सिंह के कृतित्वों को दिखाते हुए बताया कि एक अंग्रेज विद्वान ने कहा कि जब अस्सी वर्ष की अवस्था में कुंवर सिंह ने जो वीरता दिखाई अगर वे चालिस के होते तो क्या होता? उनके विरोध के चलते ही सोन नदी पर बन रहा रेलवे पुल 1856के बदले 1862 में तैयार किया जा सका।डा राय ने कहा कि संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि राष्ट्रीय स्मारकों एवं विरासत की रक्षा का दायित्व सरकार पर है। डा राजेश कुमार सिंह ने कहा कि अस्सी वर्ष की अवस्था में जो वीरता कुंवर सिंह ने दिखाई वह अन्यत्र कहीं नहीं देखा गया। डा अमृतांशु ने बाबू कुंवर सिंह से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों के विषय में विस्तार से चर्चा की। डा कमलेश सिंह ने कहा कि वर्तमान में भी कुंवर सिंह प्रासंगिक है क्योंकि कभी भी वीरता की बात कही जाती है तो उन्ही से तुलना की जाती है। राष्ट्रीय कुंवर वाहिनी के संयोजक धीरज कुमार सिंह ने कहा कि बाबू वीर कुंवर सिंह की विरासत को बचाने के लिए नयी पीढ़ी को जागरूक करने की आवश्यकता है। इस अवसर पर निर्मला शुक्ला,अनिकेत कुमार, मोहम्मद आशिक, अभिशेष चौबे, अभिनंदन कुमार, प्रमोद कुमार, जीतेन्द्र कुमार आजाद, कन्हैया कुमार, सचिन कुमार,रवि कुमार,पंकज सिंह, अरुण कुमार पाण्डेय सहित अनेक शिक्षक शिक्षिकाओं के साथ साथ शताधिक प्रतिभागीगण उपस्थित रहे।

Join us on:

Leave a Comment

और पढ़ें