:- रवि शंकर अमित!
राज्यसभा के उपसभापति डॉ. हरिवंश जी, बिहार विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री नंद किशोर यादव जी, बिहार राज्य के उप मुख्यमंत्री माननीय सम्राट चौधरी जी, बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह जी, बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष नरेंद्र यादव जी, बिहार विधान परिषद के उपाध्यक्ष राम वचन राय जी, बिहार सरकार के नागरिक ग्रामीण विकास मंत्री माननीय श्रवण कुमार जी, माननीय मंत्री गण लोकसभा में हमारे वरिष्ठ सांसद पूर्व मंत्री, पटना के सांसद रवि शंकर प्रसाद जी, सभी राज्यों के के पीठासीन अधिकारीगण, राज्य के माननीय विधायक गण भाइयों और बहनों
बिहार की यह धरती आध्यात्मिक, ज्ञान और संस्कृति की धरती है। इस धरती से भगवान बुद्ध का संदेश, करुणा शांति का संदेश आज दुनिया के अंदर पहुंच रहा है। भगवान महावीर का सिद्धांत, अहिंसा का सिद्धांत आज भी देश दुनिया के अंदर हम सबको जिओ और जीने दो की राह का संदेश दे रहा है। गुरु गोविंद सिंह जी का यह जन्मस्थान हमें साहस और सामर्थ्य का संदेश हमें देता है। लोकतंत्र की जननी भारत, वैशाली लोकतंत्र गणराज, चाणक्य के सिद्धांत, सम्राट अशोक के नैतिक मूल्य, नैतिक शासन व्यवस्था और इसी धरती से चंपारण की धरती से महात्मा गांधी जी ने जो अहिंसा का संदेश दिया, अहिंसा की यात्रा की, यह धरती हम सबके लिए प्रेरणा की धरती है । इस धरती से भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी रहे, जो संविधान निर्माता की भूमिका में रहे और संविधान निर्माण सभा के अध्यक्ष के नाते भी उन्होंने दायित्व निभाया।
यह धरती जय प्रकाश नारायण की धरती है, जिन्होंने संघर्ष से नए रास्ते दिखाए। यह धरती शोषित,वंचित गरीब लोगों के न्याय के लिए जिन्होंने जीवन भर संघर्ष किया ऐसे कर्पूरी ठाकुर जी की धरती भी है। यह धरती डॉक्टर जाकिर हुसैन जी की,
बाबू जय प्रकाश नारायण जी की अनुग्रह नारायण सिंह जी की, राम मनोहर लोहिया जी ने एक नया संदेश लोकतंत्र के अंदर दुनिया को दिया, बाबू वीर कवर सिंह जी, सुमित्र देवी सिंह जी, ऐसे बहुत सारे महान पुरुष रहे जो आज भी इस धरती के अंदर हमारे अतीत से, हमारे उनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है। और इसी धरती पर 2025 का पीठासीन अधिकारी सम्मेलन नए संकल्पों के साथ, नए विचारों के साथ देश के लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त मजबूत करते हुए, देश के 140 करोड़ लोगों को उनकी अपेक्षाएं-आकांक्षाओं के अनुसार इस लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से उनकी आकांक्षा पूरी, हो अपेक्षा पूरी हो यह सारी जिम्मेदारी पीठासीन अधिकारी के रूप में हमारी है।
और इसीलिए आज हम यह चर्चा करेंगे विचार विमर्श करेंगे । वह हमें नया ज्ञान देगा, नई प्रेरणा देगी क्योंकि यह धरती शिक्षा,ज्ञान की धरती रही है। नालंदा हो, तक्षशिला हो इस धरती से ज्ञान के न उत्पत्ति हुई और इसीलिए ज्ञान अनुभव और ज्ञान अनुभव के माध्यम से हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं का नया संदेश इस धरती से जाने वाला है।
पीठासीन अधिकारी के रूप में हमारी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, कि हम हमारे सदनों को संविधान की भावनाओं से उनके मूल्यों के अनुरूप चलाएं और इसीलिए आजादी के पहले और आजादी के बाद भी इस पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में कई निर्णय हुए, कई संकल्प हुए जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं और लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के नजदीक पहुंची और इन लोकतांत्रिक संस्थाओं से हमने समाज में आर्थिक सामाजिक कल्याण की नई दिशा दी। हमने कई अच्छी परंपराएं लागू की, कई हमने अच्छे कानून बनाएं, और यह अच्छी परंपराएं कानून बनाकर हमने सदनों को नजदीक जनता के पहुंचाने के साथ लोकतंत्र को सशक्त करने में भी इस सदनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। और इसीलिए पीठासीन अधिकारी के नाते संविधान की भावनाओं के अनुरूप संविधान की व्यवस्थाओं के अनुरूप जो हमारे संविधान निर्माता ने जो संविधान बनाया था उन महान विभूतियों को हम स्मरण करते हैं।
बाबा साहब अंबेडकर जी ने और संविधान समिति ने लंबे विचार विमर्श से इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था से तीन वर्ष तक संविधान पर चर्चा की अलग-अलग दल अलग-अलग विचारधारा के लोग थे, लेकिन उन तीन वर्ष की इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहमति-असहमति, चर्चा-संवाद से एक ऐसा संविधान बनाया जो आज हमारे लोकतंत्र को तो मार्गदर्शन कर ही रहा है, लेकिन दुनिया की लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी मार्गदर्शन कर रहा है। और इसीलिए हम उन महान विभूतियों को देखते हुए हमारे मन में भी विचार आता है, कि हम अपने अपने सदनों के अंदर इसी तरह की चर्चा संवाद उच्च कोटि की परंपराएं-परिपाटियों को कायम करते हुए सहमति-असहमति हमारे लोकतंत्र की ताकत है हम अपनी अपनी संस्थाओं को और सशक्त और मजबूत करें।
समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है,टेक्नोलॉजी में परिवर्तन हुआ है। समय के साथ हमारे सामने कुछ चुनौतियां भी आई और चुनौतियों पर समय समय पर पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में भी चर्चा हुई 1952 के बाद 1954 के अंदर सबसे पहले पीठासीन अधिकार जो चिंता व्यक्त की वह चिंता आज भी हमारी है, वह चिंता है सदन की गरिमा की, सदन की परंपरा की। और आज मुझे यह कहना पड़ रहा है कि यह चिंता गंभीर होती जा रही है । हम किस तरीके से हमारे सदनों के अंदर सदनों की गरिमा बनाए, प्रतिष्ठा बनाएं, अच्छी परंपराएं लागू करें, और उसकी गरिमा प्रतिष्ठा बनाते हुए जिस अपेक्षा के साथ जनता जनप्रतिनिधि की चुनकर भेजा है। जनता की उन अपेक्षा-आकांक्षाओं को पूरा करने का एकमात्र सदन होता है, तो विधानसभा-लोकसभा होती है।
और इसीलिए इस जिम्मेदारी को निभाते हुए हम किस तरीके से वर्तमान परिप्रेक्ष्य की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उसका समाधान का रास्ता भी हमें ढूंढना पड़ेगा। और पीठासीन अधिकारी के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कुछ चुनौतियाँ हमारे सामने है, पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में कई बार इस पर चिंता व्यक्त की, घटती विधान मंडलों की बैठकें हमारे लिए चिंता का विषय है। कई बार हर सम्मेलन के अंदर इस पर चिंता व्यक्त की। हमें प्रयास करना चाहिए कि हमें लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए हमारे जो विधान मंडलों की बैठकों की संख्या घटती जा रही है, उसको हम किस तरीके से जो पूर्व में निर्णय हुए हैं, स्पीकर सम्मेलन में उस संकल्पों को लागू करने का प्रयास करें। दूसरा नई दिल्ली के अंदर सभी राजनीतिक दलों में पीठासीन अधिकारी भी थे, सभी राजनीति दल के नेता थे और उन्होंने एक विचार व्यक्त किया था कि सदनों के अंदर लगातार व्यवधान, बेल में आना, नारेबाजी करना, नियोजित तरीके से सदन स्थगित करना, इन सारे विषयों पर बड़ी गंभीर चर्चा हुई थी। और वह चिंता आज भी है, हमें कोशिश करना चाहिए सभी राजनीतिक दलों से चर्चा करकर कि हम सदन में व्यवधान कम करें। नियोजित गतिरोध को रोकने का प्रयास करें। सदन की गरिमा प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए सभी राजनीति दल सहयोग करें। महामहिम राज्यपाल के अभिभाषण के समय सदन में गरिमा रहे। इन सारे विषयों पर बड़ी गंभीर चर्चा हुई थी क्योंकि पटना एक ऐतिहासिक धरती है हमें कुछ फैसले लेकर यहां से लेकर जाना होगा।
मेरी सभी राजनीतिक दलों से भी यह अपेक्षा है कि वह अपने अपने दल में एक आचार संहिता बनाएं, सदनों में अपने-अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सदनों की गरिमा प्रतिष्ठा बनाने के लिए राजनीतिक दल आचार संहिता बने । क्योंकि किसी भी सदन की गरिमा उस सदन के माननीय प्रतिनिधि से है। जितना जनप्रतिनिधि की मर्यादा पूर्ण आचरण करेंगे ,आदर्श जनप्रतिनिधि की भूमिका निभाएंगे,उतनी सदन की गरिमा भी बढ़ेगी और हम लोकतंत्र को सशक्त मजबूत करते हुए शासन की जवाबदेही और पारदर्शिता भी लाएंगे। इसीलिए मैं आग्रह करूंगा कि अपने अपने सदनों की प्रोडक्टिविटी बढ़े सार्थक चर्चा हो, माननीय सदस्यों की कैपेसिटी बिल्डिंग हो, उनकी दक्षता कौशल बड़े इसके लिए सदय समय पर हम चर्चा करते रहते हैं। मुझे आशा है कि गंभीर चर्चा मंथन से हमारे प्रयासों को सलता मिलेगी और हम लोकतंत्र के अंदर हमारे जनप्रतिनिधि की भूमिका को और सार्थक बना पाएंगे ताकि सदनों में सार्थक चर्चा हो उपयोगी चर्चा हो परिणाम पूर्व चर्चा हो ताकि शासन और प्रशासन जवाबदेही हो और पारदर्शिता भी हो। हमारे उपाध्यक्ष जी ने उप मुख्यमंत्री जी ने चर्चा की संसदीय समिति 1954 में भी यह विचार आया था कि हमें संसदीय समितियों की भूमिका को और बढ़ाना चाहे यह मिनी पार्लियामेंट की तरह होता है और जितनी संसदीय समितियों की भूमिका बढ़ाएंगे उतनी शासन में जवाब दे आएगी प्रशासन में पारदर्शिता ईमानदारी आएगी। जनता के धन का उपयोग ठीक होगा ,सार्थक उपयोग होगा और धन का व्यय जिस मद के लिए किया गया है उस मद में की धन की निगरानी होगी इसलिए संसदीय समितियों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।
इसलिए मैं आग्रह करूंगा कि विधानसभा के पीठासीन अधिकारी भी अपने-अपने यहां पर संसदीय समितियों की भूमिका को और बेहतर करें टेक्नोलॉजी का उपयोग भी करें और बेहतर तरीके से हम इन संसदीय समितियों के माध्यम से सार्थक परिणाम ला सके। यह वर्ष संविधान की 75वीं वर्षगाँठ है, इसलिए हमने विषय रखा है कि संवैधानिक मूल्यों को सुरक्षित करने में और राज्य की भूमिका मुझे आशा है कि इसके लिए हमारे गंभीर प्रयास होंगे और गंभीर प्रयासों के परिणाम भी आएंगे। क्योंकि जब संविधान बना था उस समय हमने सहकारी संघवाद संवाद के विचार को अपनाया था। इसलिए राज्य भी और राज्य की विधानसभाओं की भी अपनी स्वायत्तता है लेकिन इसके साथ एक विचार यह भी आया था कि स्वायत्ता के साथ-साथ हम सामूहिक से मिलकर भी काम करें कुछ एजेंडे ऐसे होने चाहिए जो पूरे देश के लिए एक जैसे होने चाहिए समान रूप से होना चाहिए ।
और इसीलिए यह वर्ष 2025 का हमारे सामूहिक रूप से हमने प्रयास किए कि हमारे नियम, प्रक्रिया, परंपरा, परिपाटियाँ अपनी अपनी राज्य की स्वायत्ता होने के बाद भी एक राज्यव्यापी बने देशव्यापी बने और इसी के साथ हमने जब पहली निर्णय लिया था कि डिजिटल रूप से भी हमारी सभी राज्य की विधान सभाएं, आज मुझे कहते हुए खुशी हो रही है कि, देश की अधिकतम राज्य की विधानसभा पेपरलेस हो चुकी है। अधिकतर राज्य की विधानसभाओं ने अपनी डिबेट और चर्चा को डिजिटलीकरण कर दिया है। अब आने वाले समय में एक ही प्लेटफार्म पर राज्य की विधायकों की सारी डिबेट चर्चा बजट, केंद्रीय विधानमंडल राज्यसभा लोकसभा की एक ही प्लेटफार्म पर देश की जनता को कारवाई को देखने को मिलेगा। और एक प्लेटफार्म पर जब राज्य की विधानसभा और लोकसभा राज्य की कारवाई होगी तो निश्चित रूप से कानून बनाते समय हमारे जनप्रतिनिधि सार्थक चर्चा कर पाएंगे बजट के अनुभवों का लाभ भी प्राप्त कर पाएंगे और बजट पर भी सार्थक चर्चा कर पाएंगे।
इसलिए एआईपीएसी ने निर्णय लिया है कि हम एक प्लेटफार्म पर 2025 तक हमारे लक्ष्यों को पूरा करेंगे और एक प्लेटफार्म पर एक देश एक विधान की कार्य को पूरा करेंगे। इसी के साथ राज्य की जिम्मेदारी और बन जाती है कि राज्य की विधानसभाएं भी अपनी कई लोकतांत्रिक संस्थाएं चाहे पंचायत राज हो चाहे नगरीय हो चाहे कोऑपरेटिव सेक्टर हो हमारी सारी कोऑपरेटिव से लेकर पंचायत से लेकर संसद तक की जितनी हमारी लोकतांत्रिक संस्थाए हैं इन लोकतांत्रिक संस्थाओं को में सशक्त करना पड़ेगा। इन सदनों के अंदर उपयोगी चर्चा सार्थक चर्चा हो। पंचायत के अंदर भी वहां की समस्याओं वहां की कठिनाइयों वहां की चुनौतियों पर सार्थक चर्चा हो। नगरीय क्षेत्र के अंदर भी नगरीय सरकारों में भी इसी तरीके की चर्चा हो जब हमारे लोकतंत्र के सारे मैक्म सिस्टम के अंदर बेहतरीन चर्चा संवाद होने लगेंगे तो एक महत्त्वपूर्ण परिणाम आएंगे मेरा मानना है।
शासन में भी पारदर्शिता और जवाब दे आएगी और प्रशासन में भी ईमानदारी आएगी और हम बेहतर परिणाम जिस अपेक्षा के साथ हमें चुनकर भेजा है हम श्रेष्ठ परिणाम जनता को दे पाएंगे क्योंकि लोकतंत्र हमारी ताकत है और लोकतंत्र ही से ही हमने इस देश को आगे बढ़ाया है इसलिए लोकतंत्र की छोटी संस्थाएं भी इतनी उपयोगी है जितनी देश की बड़ी लोकतांत्रिक संस्था है। इसलिए हमारी कोशिश होना चाहिए जो संविधान की मूल भावना है कि हम न्याय आधारित समता मूलक समावेशी और प्रगतिशील समाज के निर्माण में इन लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को बढ़ाए।
मैं आपसे इतना आग्रह करना चाहता हूं अब समय आ गया है, कि हम सामूहिक के साथ मिलकर हम लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त करें मजबूत करें जनता की अपेक्षाओं आका कां साओं के अनुरूप हमारे सदन सार्थक चर्चा के केंद्र बने। मर्यादा प्रतिष्ठा सदनों की बढ़े। और सदनों के अंदर हम जनता की अपेक्षा आकांक्षाओं के अनुसार एक बेहतर परिणाम दे सकें, ताकि लोकतंत्र भी मजबूत हो और इस 75 वर्ष की लोकतांत्रिक यात्रा में हम किस तरीके से और देश और राज्य के विकास में इन लोकतांत्रिक संस्थाओं का योगदान हो । आप सब यहां पर आए और विशेष रूप से मैं बिहार विधानसभा के अध्यक्ष जी को धन्यवाद दूंगा जिन्होंने पटना में इस अधिवेशन को करने के लिए सुझाव दिया। मुझे आशा है आने वाले समय के अंदर सभी राज्य भी अपने अपने राज्यों के अंदर पूरे एक वर्ष तक हम संविधान की 75 वीं वर्षगाँठ पर कार्यक्रम करेंगे समाज के अलग-अलग स्टेट होल्डर को चाहे विद्यार्थी हो नौजवान हो महिलाओं एनजीओ तमाम जितने भी संस्थाए हैं उन संस्थाओं को लोकतंत्र और लोकतंत्रिक संस्थाओं और संविधान के बारे में जानकारी हो ताकि हर देश की जनता जब कभी कानून बने तो कानून में अपने महत्त्वपूर्ण सुझाव दे सके चर्चा के अंदर हमारे जनप्रतिनिधि को सुझाव दे सके ताकि हम और सार्थक चर्चा संवाद इन सदनों में करें आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद।




