कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर:-
हम बोलेगा तो कहेगा कि बोलता है
यही रात अंतिम यही रात भारी, मंगलवार को किसका मंगल और किसका अमंगल?
कहते हैं राजनीति में कोई किसी का ना ही दोस्त होता ना ही कोई किसी का दुश्मन। सत्ता के तराजू में सियासत की चासनी को मोलभाव किया जाता है। बस सत्ता के करीब पहुंचना है। कुछ ऐसा ही वाकया इस वक्त बिहार का चल रहा है। जहां तीर के दो नेता आपस में भिड़ गए हैं। और छींटाकशी का दौर शुरू है। कोई पार्टी को डूबता हुआ सूरज कह रहा है तो कोई दौड़ता हुआ बरहाल ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा आखिर ऊंट किस करवट बैठ रहा है। दूसरी ओर बिहार के सियासी गलियारों में एक और भूचाल मचा हुआ है। मंगलवार को बैठकों का दौर जारी रहेगा। भले ही पानी के लिए जनता की हलक सूख रहा हो दरअसल राजनीति विश्लेषक बताते हैं कि इन दोनों नेताओं के बीच मंत्रिमंडल को लेकर शुरू से ही खींचतान चल रहा था। इस बीच आरपीसी सिंह की पकड़ केंद्र में जबरदस्त होती जा रही थी जिससे सुबे के मुखिया को कहीं ना कहीं डर सताने लगा था। राजनीति विश्लेषक यह भी बताते हैं कि आप अगर गौर करेंगे तो यह वही पार्टी है। जहां कभी धुरंधर नेता दिग्विजय सिंह ,जॉर्ज फर्नांडिस, हुआ करते थे। और जब जॉर्ज फर्नांडिस को मुजफ्फरपुर से टिकट काट लिया गया। तो जनता के राजा दिग्विजय सिंह ने बगावत कर दी और राज्यसभा सदस्य से इस्तीफा दे दिया। अपने लोकसभा सीट बांका आकर निर्दलीय चुनाव लड़े। जिसके बाद सत्तासीन की कुर्सी हिल गई थी।उपेंद्र कुशवाहा को भी दरकिनार कर दिया हालांकि उपेंद्र कुशवाहा पार्टी में कई बार गए और कई बार आए। वर्तमान में वह अभी जदयू में ही हैं। लाजमी है बोल तो जदयू के ही बोलेंगे। जिसके बाद राजनीति विश्लेषक यह भी बताते हैं कि नीतीश कुमार कि जब लुटिया डूब रही थी। जातीय समीकरण साधना बहुत ही जरूरी था। उस वक्त मोकामा के बाहुबली अनंत सिंह को खेवनहार बनाकर अपनी नैया पार लगा लिया था। जिसके बाद इनाम के रूप में उन्हें जदयू से टिकट भी दिया गया था। टिकट देने पर नीतीश कुमार की पूरे सूबे में किरकिरी हुई थी।हालांकि बाद में उन्होंने जदयू को छोड़कर राजद में ज्वाइन कर लिया। और फिलहाल जेल में बंद है।




