मधुश्रावणी’पर्व हर्षोल्लास के बीच श्रद्धापूर्वक मनाया गया !

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रिपोर्ट -अनमोल कुमार :-

मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का पवित्र पर्व ‘मधुश्रावणी’ भक्तिभाव व हर्षोल्लास के बीच श्रद्धापूर्वक मनाया गया !

मधुबनी। इस पर्व में मैथिल नवविवाहिताएं महिला पुरोहितों के दिशा-निर्देशन में अपने पति के दीर्घायु रहने और अचल सुहाग के हेतु लगातार चौदह दिनों तक बासी फूलों से शिव-शक्ति की पूजा-अर्चना करती हैं!

चलु-चलु बहिना हकार पुरय लए
गौरी दाइक बर एला टेमी दागय लए

मैथिली-पुत्र प्रदीप जी के सुप्रसिद्ध गीत का प्रथम पद अमर सुहाग के कामना से परिपूर्ण मिथिलांचल के पवित्र पर्व मधुश्रावणी का साक्षात चित्रण करता है। इस बार यह पर्व आज समूचे मिथिलांचल में अत्यंत ही भक्ति-भाव व हर्षोल्लास पूर्वक नवविवाहित मैथिल ललनाओं द्वारा मनाया गया।
बताते चलें कि मैथिल नवविवाहिताओं द्वारा यह पर्व मुख्यतः अपने मायके में ही मनाया जाता है जो सावन कृष्ण पक्ष के पंचमी (नाग पंचमी) से शुरू होकर मधुश्रावणी तक चलता है। पवित्र सावन माह में शिव-शक्ति को समर्पित इस पर्व के आगमन की आहट आते ही मिथिलांचल के गांव-गलियों में मधुश्रावणी के गीत गुंजायमान होने लगते हैं। वहीं इस पर्व की अपनी कुछ अनूठी विशेषताएं इसे अलौकिक बनाती हैं।
इस पर्व में सिर्फ नवविवाहिताएं ही भाग लेती हैं। जहां वे चौदह दिनों तक अपने ससुराल से आये हुए अन्न से पकाए हुए भोजन को सिर्फ एक बार ग्रहण करती हैं वहीं चौदहों दिन शाम को साज-श्रृंगार के साथ
सखी-सहेलियों के संग फूल-पत्र एकत्र कर प्रातःकाल उसी बासी फूलों से महिला पुरोहित की देख-रेख में प्रतिदिन गौरी-शंकर की पूजा-अर्चना करती हैं। पूजा के उपरांत प्रतिदिन व्रतियों द्वारा महिला पुरोहित द्वारा शिव-शक्ति से सम्बंधित कही गयी विभिन्न कथाओं का श्रवण करती हैं।
एक अनूठे परम्परा के तहत मधुश्रावणी के दिन पूजन के पश्चात नवविवाहिताओं के दोनों घुटनों को उनके पति द्वारा जलते रुई के दिये से दागा जाता है, किवंदतियों के अनुसार जिसके घुटनों पर जितना अच्छा फफोला पड़ेगा उसका सौभाग्य उतना ही अचल रहेगा। कुल मिलाकर यह पर्व अपने सुहाग के अचल रहने की कामना के संग प्रतिवर्ष नवविवाहिताओं द्वारा पूर्ण मनोयोग से मनाया जाता है।

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