क्या 2024 में अब भी विपक्षी उम्मीद कायम है?

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कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर शंखनाद मीडिया हाउस!

दरअसल इस हमाम में आपको सभी नंगे ही नजर आएंगे।

(हम बोलेगा तो कहेगा कि बोलता है)

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के उस सच को सामने लाकर खड़ा कर दिया। जो शायद अभी आम जनमानस से दूर था। राष्ट्रपति चुनाव ने विपक्ष को पर्दे से निकालकर बेपर्दा कर दिया शायद यह किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन परत दर परत खुलते गई और सब सच सामने आते गई। हर नेता की अपनी जरूरत जरूरत ही नहीं सौदेबाजी और सौदेबाजी नहीं सत्ताआखिर कैसे बचाया जाए। सत्ता खिसके नहीं और राजनीति पकड़ कम से कम दिल्ली तक हो, अब अगर आप टटोलेंगे तो विपक्ष कभी एक हो ही नहीं सकता क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह से विपक्ष का बिखराव दिखा और वह चुनाव से पहले ही धराशाई हो गई। यानी मुद्दे गायब हो गए और विपक्ष टूटती रही। चाहे वह मुद्दा मंडल कमंडल बीजेपी की हड़पने की हो या ईडी की चाल ओबीसी की सियासत यादव दलित का प्रेम। जो दल राजनीतिक फायदे के लिए दल को तोड़ती है और वह अचानक विपक्ष से कदम खींचकर सत्तापक्ष की ओर बात शिवसेना तक आ पहुंची। अगर हर नेता को आप परखना शुरु कीजिएगा तो आपकी हथेली खाली मिलेगी। और दरअसल आप अगर देखेंगे तो इस हमाम में आपको सभी नंगे नजर आएंगे। इसमें सबकी अपनी जरूरत है इसमें ना कोई मुद्दा है ना कोई दावा है ना आम जनमानस की भलाई है। सरकार विपक्ष विहीन होते जा रही है। जो आम जनमानस के लिए कतई शुभ संकेत नहीं कहा जाएगा।

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