कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर!
किश्त 4
लालू ने मंडल मसीहा शरद यादव को बीपी मंडल की धरती (मधेपुरा) से संसद भवन भेज दिया। आनंद मोहन अब जनता परिवार से अलग हो चुके थे। शरद यादव से राजनीतिक हार के बाबजूद वे एक बड़ा नाम बन चुके थे।
तकरीबन डेढ़ साल बाद वैशाली के तत्कालीन सांसद जनता दल के शिव शरण सिंह की मृत्यु हो गई। 1994 में इस सीट पर उपचुनाव तय हो गया। यहां कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री सच्चिदानंद सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा जैसी हैवीवेट प्रत्याशी को मैदान में उतारा था। आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी के नाम से नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया और अपनी पत्नी लवली आनन्द को यहां से लड़ा दिया। किशोरी सिन्हा की दूर से रिश्तेदार हैं लवली। यहां चुनावी मैदान में चुनाव चिह्न ढाल-तलवार लेकर मजबूती से खड़ी हो गईं। यह चुनाव तब उन्हें निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मिला और बाद में यही उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न बना।
तब वैशाली संसदीय उपचुनाव में बड़े-बड़े कटआउट में लवली का चेहरा पालिटिक्स में बाहुबल के साथ ग्लैमर का तड़का लगा रहा था। इधर, लालू कांग्रेस के डूबते मनोबल में आखिरी कील ठोंकने की राजनीति सोच ली थी। लालू ने इस सीट को गुप्त तरीके से लवली को जीतने दिया। लवली आनंद की जीत से वाकई कांग्रेस के मनोबल को गहरा आघात पहुंचा। दूसरी ओर आनंद मोहन अगड़ों के बीच लोकप्रिय नेता के रूप में उभरने लगे।
अब आनंद मोहन पूरे बिहार में राबिनहुड की छवि बनाकर खुद को बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर चुके थे। लालू प्रसाद ने अगड़ों के बीच बाहुबली आनंद मोहन के प्रभाव को पिछडों में एक अघोषित भय के रूप में दिखाना शुरू किया। इसी दौरान जातिवादी राजनीति के बढ़ते दखल के बीच लालू प्रसाद को भीषण अघात लगा। इमरजेंसी के हीरो जार्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार ने अपने रास्ते जनतादल से अलग कर लिया और 1994 में ही समता पार्टी के नाम से नए राजनीतिक संघठन की नीव डाल दी।
राजनीतिक बातों के बीच नजर डालें तो लालू प्रसाद ने 1991 में एक नायाब काम किया। उन्होंने सोशल इंजिनयरिंग और शिक्षा को जोड़ते हुए मुजफ्फरपुर के तुर्की नामक स्थान पर 23 दिसंबर 1991 को चरवाहा विद्यालय की स्थापना कर दी। चरवाहा विद्यालय की लालू की घोषणा वाकई कुछ अलग थी। इतनी अलग कि अमेरिका और जापान तक ने लालू पर उनके प्रयोग पर रिसर्च करने एक टीम भेज दी थी।
एक तरफ लालू प्रसाद ने दुनिया को चरवाहा विद्यालय के तिलिस्म में फंसा रखा था, दूसरी ओर शिबू सोरेन को मानसिक झटका दिया। झारखंड आंदोलन के नाम पर शिबू सोरेन से समर्थन लेने वाले लालू ने ऐलान कर दिया कि झारखंड का गठन मेरी लाश पर होगा। लालू के इस एलान से आहत शिबू सोरेन ने 11 जुलाई 1992 को बिहार सरकार से यह सोचकर समर्थन वापस ले लिया कि लालू की सरकार गिर जायेगी। किंतु, शिबू सोरेन को लेने के देने पड़ गए। शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा ही टूट गई और लालू ने अपनी सरकार बचा ली।
आइये वापस चलते हैं फिर साल 1994 की ओर। झारखंड आंदोलन अपने पीक पर था। इधर, लालू के पहले कार्यकाल का अंत आ गया था। किन्तु, चुनावों से ठीक पहले बिहार में लगातार हो रही लोकतांत्रिक लूट यानी बोगस वोटिंग, बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक हिंसा इत्यादि से निदान पाने के लिए तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव सुधारों के लिए बिहार को एक चुनौती के रूप में लिया।
(कहानी जारी है, अगले अंक में जानिये शेषन बनाम लालू और फोटो पहचानपत्र के साथ केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के साए में 1995 के बिहार विधान सभा चुनावों की कहानी)




