कार्यकारी संपादक पंकज कुमार ठाकुर।
तुम्हारे गांव में फसल का मौसम गुलाबी है, लेकिन यह दावे किताबी है, दुर्भाग्य तो झेलना ही होगा?
हम तो बोलेंगे!
तुम्हारे गांव में फसल का मौसम गुलाबी है, लेकिन यह दावे और वादे किताबी है। कहीं न कहीं यह पंक्ति पंचायत चुनाव पर सटीक जरूर बैठती है। सरकार के पास योजनाओं का भंडार है। लेकिन नवनिर्वाचित मुखिया 9 माह में 9 कदम भी नहीं चल पाए हैं। दरअसल रजौन प्रखंड में 18 पंचायत है। जहां कमोबेश मजदूरों की भरमार है प्रवासी मजदूर आकर भी कोरोना के बाद यही टिक गए हैं। जॉब कार्ड की तो भरमार है। लेकिन सब बेरोजगार है। दरअसल प्रखंड के 18 पंचायत में से कई पंचायत के मुखिया इस बार नव निर्वाचित होकर आए हैं। और उन नवनिर्वाचित मुखिया का पार्टी संबंध कोई ना कोई है ही अब ऐसे में फिलहाल पक्ष और विपक्ष का खेल चल रहा है तो बड़े चुनाव में व्यस्तता भी मुखिया जी की एक मजबूरी रही। दरअसल अपना क्षेत्र जाए भाड़ में पार्टी के आलाकमान के आदेश को मानना है। हुजूर पंचायत ने भी आपको अपना विश्वास सौंपा कहते हैं ना यह जनता है हवा का रुख मिनटों में चेंज कर देता है। मुखिया जी से अगर आप काम की बात करें तो मुखिया जी पुरानी गलतियों को दोहराते हुए अपने को पाक साबित करने में लग जाते हैं। दरअसल लाजमी है जनता को उलझा के रखना है। जनता के जेहन में कोई भोकाल मचा देना है। जिससे विकास की इर्द-गिर्द उसका ध्यान तक नहीं पहुंच पाए। ऐसे में अब सत्तासीन सरकार की मुखिया जी भी काम में अभी तक जीरो ही साबित हुए हैं। यकीन मानिए इन सभी से कहीं ना कहीं सुशासन सरकार की भी धूल धुसरित तो होती है। तो आम जनमानस के लबों पर सरकार के खिलाफ आक्रोश आना लाजमी है। अब ऐसे में कई पंचायत के कई गांव के लोग अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लगे हैं। 9 माह बीत जाने के बाद भी मुखिया जी ने 9 कदम भी धरातल पर काम नहीं कराया है। जबकि सरकार की योजनाओं में मनरेगा, वृक्षारोपण समेत कई योजना रजौन प्रखंड में सुचारू रूप से चल रही है। लेकिन वह भाग्यशाली पंचायत है। जहां विकास की बयार बह रही है। जागीए मुखिया जी सत्तासीन सरकार की बट्टा लग रही है।




