वसंत ऋतु में स्वरकोकिला का यूँ जाना …….

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डॉ. कल्याणी कबीर!

थम गया सुरीले स्वर का समंदर , भावनाओं की लहरें, जीवन के हर भाव से कदमताल करती एक मखमली आवाज ,गंभीर व्यक्तित्व की स्वामिनी और निष्पक्ष – निरपेक्ष होकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करने वाली संत ह्रदया लता मंगेशकर इस लोक से विसर्जन ले लीं। बहुत पीड़ा दायक है, वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही इस देश की स्वर कोकिला का यूं रूठ जाना और महाप्रयाण पर चले जाना ।
” ना भूतो , ना भविष्यति” महान गायिका लता मंगेशकर ऐसी ही थीं। संगीत की दुनिया में होने वाले उतार-चढ़ाव और राजनीति से बिल्कुल दूर अपनी एक सशक्त पहचान बनाने वाली अद्भुत गायिका, लता मंगेशकर अपने स्वर और सुर के बल पर करोड़ों के दिलों पर राज करती रहेंगी।

उनकी आवाज हर उस अहसास की आवाज़ थी जिसने जीवन में संवेदना और प्रेम को गहराई से महसूस किया हो । दिलों के जुड़ने की ललक और दिलों के टूटने की कसक, दोनों ही भाव उनकी आवाज़ में जीवंत हो उठते थे।
ईश्वर को पुकारने की बात हो या अकेले चलने का संदेश हो, ये सारी बातें , ये विचार उनकी आवाज़ में लयबद्ध होकर सुनने वाले को एक ऊर्जा देते थे ,एक रोशनी दिखाते थे।
कई बार मैं जब निराशा और अवसाद को महसूस करती हूँ , जब भी एक नकारात्मक और निराशाजनक आभास होता है तो मैं उनके गाये कुछ चुनींदा गानों को सुना करती हूँ। यकीनन इनके गाये गाने कहीं न कहीं गहराई तक उतर कर मरहम का काम करते हैं । निस्संदेह
मेरे ही साथ नहीं बल्कि कई लोगों के साथ ऐसा होता होगा।
यह कोई आवाज का जादू नहीं बल्कि एक ईश्वरीय शक्ति में लिपटी हुई आवाज है, एक ऐसे व्यक्तित्व की आवाज जो सुरसाधिका, राष्ट्रभक्त और प्रेरक व्यक्तित्व रही हो और जिनके कंठ से निकली हर वाणी को हमने मां सरस्वती का संदेश माना हो। लता मंगेशकर का व्यक्तित्व मिश्री की तरह स्नेहिल और आवाज गुड़ की तरह मीठी थी। लाल किला से उन का गाया हुआ गीत “ए मेरे वतन के लोगों “आज भी पत्थर हृदय में भी राष्ट्रप्रेम की भागीरथी प्रवाहित कर देता है। उनका होना संगीत की दुनिया के लिए एक कुंदन का होना था। उनका नहीं होना सुरों की दुनिया को एक अघोषित, अनिश्चित खालीपन दे गया है।

डॉ कल्याणी कबीर
जमशेदपुर

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