रिपोर्ट – आशुतोष पांडेय
आरा जंक्शन सबकी सुनता है, लेकिन उसकी सुनने वाला कौन?
करोड़ों का राजस्व देने वाले स्टेशन के प्रवेश द्वार पर जलजमाव, गंदगी और अव्यवस्था से यात्री परेशान
आरा। पूर्व मध्य रेलवे का महत्वपूर्ण आरा जंक्शन प्रतिदिन हजारों यात्रियों की आवाजाही का गवाह है। अधिकारियों की सुनता है, यात्रियों की सुनता है, जनप्रतिनिधियों की सुनता है और यहां तक कि सर्कुलेटिंग एरिया में नियम-कायदे को ताक पर रखकर कारोबार करने वालों की मौजूदगी भी चुपचाप सहता है। लेकिन सवाल यह है कि आरा जंक्शन की सुनने वाला आखिर कौन है?
स्टेशन की बदहाल व्यवस्था यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। कहीं जलजमाव, कहीं गंदगी, कहीं मल-मूत्र का बहाव तो कहीं अव्यवस्थित आवागमन—इन समस्याओं के बीच यात्रियों को स्टेशन परिसर में प्रवेश करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि स्टेशन के प्रवेश द्वार पर ही यात्रियों का स्वागत पानी और गंदगी से हो रहा है।
हाल में काफी दिनों बाद स्टेशन पहुंचे एक यात्री को मुख्य प्रवेश द्वार के समीप जलजमाव का सामना करना पड़ा। वहीं, मल-मूत्र के बहाव वाले रास्ते से बचने के लिए जब बाईं ओर से निकलने का प्रयास किया गया तो वहां मौजूद एक दुकानदार ने बताया कि करीब एक महीने से रास्ते की यही स्थिति बनी हुई है और चलने लायक रास्ता स्थानीय लोगों ने खुद तैयार किया है।
मामला सामने आने के बाद इसकी सूचना तत्काल दानापुर मंडल के डीआरएम और पूर्व मध्य रेलवे, हाजीपुर के महाप्रबंधक को दी गई। साथ ही समस्या का शीघ्र समाधान कराने की मांग करते हुए स्पष्ट किया गया कि यदि दो दिनों के भीतर जलजमाव और रास्ते की समस्या का निदान नहीं हुआ तो सर्कुलेटिंग एरिया में रोड़ा गिरवाकर आवागमन योग्य रास्ता तैयार कराने की पहल की जाएगी।
राजस्व में आगे, सुविधाओं में पीछे क्यों?
आरा जंक्शन रेलवे के लिए महत्वपूर्ण राजस्व देने वाले स्टेशनों में शामिल है। दावा है कि स्टेशन सालाना करीब सवा अरब रुपये का राजस्व रेलवे बोर्ड को देता है और यहां प्रतिवर्ष एक करोड़ से अधिक यात्रियों का फुटफॉल रहता है। इसके बावजूद स्टेशन परिसर की मूलभूत व्यवस्थाओं पर लगातार सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है।
वैध-अवैध वेंडरों की मनमानी, सर्कुलेटिंग एरिया में अव्यवस्था, सफाई व्यवस्था में खामियां, निर्धारित संख्या से कम कर्मियों की तैनाती के आरोप और जलनिकासी की समस्या—ये सभी मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
विडंबना यह है कि जब व्यवस्था बिगड़ती है तो उसकी नाराजगी यात्रियों को झेलनी पड़ती है और यात्रियों का गुस्सा स्टेशन पर निकलता है। जबकि स्टेशन स्वयं इन समस्याओं का जिम्मेदार नहीं, बल्कि वह तो व्यवस्था की कमियों का मूक गवाह बना हुआ है।
काश, आरा जंक्शन बोल पाता…
अगर आरा जंक्शन बोल पाता तो शायद वह यात्रियों से यही कहता—
“मुझे क्यों गाली देते हो?
मैं तो चाहता हूं कि तुम साफ-सुथरे रास्ते से मेरे भीतर आओ।
मैं चाहता हूं कि तुम्हें बेहतर सुविधा मिले।
काश! मेरी सफाई, रख-रखाव और व्यवस्था के जिम्मेदार लोग मेरी भी सुन लेते।”
आरा जंक्शन की समस्या केवल जलजमाव या गंदगी तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां राजस्व देने वाला स्टेशन सुविधाओं के लिए बार-बार शिकायतों का मोहताज नजर आता है।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस बार भी समस्या को सिर्फ शिकायत मानकर छोड़ देते हैं या फिर दो दिनों के भीतर जलजमाव और सर्कुलेटिंग एरिया की बदहाल स्थिति का स्थायी समाधान कर यात्रियों को राहत देते हैं।
इंतजार रहेगा—आरा जंक्शन की आवाज आखिर कब सुनी जाती है?



