पंकज कुमार जहानाबाद
मोहर्रम की सातवीं तारीख़ को अलीनगर पाली का ऐतिहासिक इमामबाड़ा एक बार फिर अक़ीदत, मोहब्बत और गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल बन गया, जब बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी अपने पुराने रिवायत के मुताबिक़ इमामबाड़े में हाज़िर हुए, शमा रौशन की और मुल्क व इंसानियत के लिए अमन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ मांगी।
पाली इमामबाड़े से मंत्री अशोक चौधरी का रिश्ता कोई सियासी नहीं, बल्कि रूहानी और दिली लगाव का है। दो दशक से भी ज़्यादा समय से वह हर साल मोहर्रम के दिनों में यहां आते रहे हैं। इमामबाड़े की चौखट पर अदब से सर झुकाते हैं, अपनी मन्नतें मांगते हैं और हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की बारगाह में अपनी अक़ीदत पेश करते हैं।
इस मौके पर जब उनसे उनके इस अटूट रिश्ते और अक़ीदे के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने बड़े एहतराम और अपनापन के साथ कहा कि “पाली इमामबाड़ा मेरे लिए सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि रूहानी सुकून का मरकज़ है। यहां आने से दिल को ताक़त मिलती है, मन को सुकून मिलता है और दुआओं में एक अलग ही असर महसूस होता है।”
मंत्री ने काको की पुरानी तहज़ीब, यहां की मुहर्रम परंपरा और हिंदू-मुस्लिम एकता के उस खूबसूरत चेहरे का भी ज़िक्र किया जो सदियों से इस धरती की पहचान रहा है। उन्होंने कहा कि काको की मिट्टी मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम देती है। अशोक चौधरी की इस अकीदत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी सांसद पुत्री को भी पूर्व में यहां लेकर आए थीं और उन्हें इमामबाड़े की ज़ियारत कराई ,थीं ताकि आने वाली नस्लें भी इस साझा विरासत, मुहब्बत और आध्यात्मिक परंपरा से रूबरू हो सकें। इस अवसर पर घोसी विधायक ऋतुराज ने भी शमा रौशन कर अपने विधानसभा क्षेत्र की तरक़्क़ी, खुशहाली और अमन-चैन के लिए दुआ मांगी। उन्होंने कहा कि मोहर्रम हमें इंसाफ़, कुर्बानी और इंसानियत का पैग़ाम देता है। इमामबाड़े का माहौल उस समय बेहद रूहानी और भावुक हो गया जब दुआ के लिए हाथ उठे। हर आंख में अकीदत, हर दिल में मोहब्बत और हर ज़ुबान पर अमन की दुआ थी। ऐसा महसूस हो रहा था मानो सदियों पुरानी यह चौखट आज भी इंसानियत को जोड़ने और दिलों को करीब लाने का काम कर रही हो। इस मौके पर सैय्यद अलमदार हुसैन, सैयद सलमान हुसैन, रॉकी यादव, तरुण यादव, हैदर काज़मी, अकील काज़मी, सैयद अली इमाम, सैयद मोहम्मद सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद और गणमान्य लोग मौजूद रहे। पाली इमामबाड़ा आज भी उस साझा संस्कृति और भाईचारे की जीवंत मिसाल है, जहां मज़हब की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं और इंसानियत सबसे बड़ा रिश्ता बनकर सामने आती है। शायद यही वजह है कि वर्षों से लोग यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं और दिलों में उम्मीद की रोशनी लेकर लौटते हैं।



