रिपोर्ट – संतोष तिवारी!
शाही लीची के किसानों की पीड़ा: एक अस्तित्व का संकट
भारत की भूमि को ‘कृषि प्रधान देश’ कहा जाता है, लेकिन आज जब हम बिहार के मुजफ्फरपुर की बात करते हैं, तो वहाँ की शाही लीची न केवल एक फल है, बल्कि एक पहचान है, एक विरासत है, जो सदियों से इस क्षेत्र की मिट्टी और किसानों के पसीने से सींची गई है। लेकिन आज यही शाही लीची अपने किसानों के आँसुओं में डूबती जा रही है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे महानगरों के गद्दीदारों ने इस मीठे फल के कारोबार को अपने जाल में फँसा लिया है, और किसान मजबूर होकर अपनी जमीन, अपनी मेहनत और अपने सपनों को दांव पर लगा रहे हैं।
उद्यान रत्न लीची किसान भोलानाथ झा का कहना है कि ये गद्दीदार, जिनके पास न तो एक फुट जमीन है और न ही एक भी लीची का पेड़, वे अपने आदमियों के जरिए छोटे-बड़े सभी बागानों को खरीद लेते हैं। किसान को फाइनेंस भी उन्हीं से करनी होती है, और फिर उसका शोषण शुरू हो जाता है। लीची की फसल पर मेहनत किसान करता है, पसीना बहाता है, लेकिन मुनाफा गद्दीदार की जेब में जाता है। यह कोई नया खेल नहीं है, बल्कि दशकों से चला आ रहा एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें किसान उत्पीड़ित है और गद्दीदार शोषक।
सरकार की बात करें, तो उद्यान रत्न भोलानाथ झा ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार लीची किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है। न कोई बीमा योजना है, न अनुदान, न खाद-बीज की कोई व्यवस्था। वहीं, गेहूँ, धान या अन्य फसलों के किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है, लेकिन लीची किसान को कोई मदद नहीं मिलती। यह दोहरा मापदंड है, जो मुजफ्फरपुर के शाही लीची किसानों को तोड़ रहा है।
इस साल 2026 में कीड़े के प्रकोप ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। लीची के पेड़ों पर फल नहीं लगे, या जो लगे वे बेकार हो गए। किसान माथा पकड़कर बैठ गए हैं। उनके पास कोई सहारा नहीं, न सरकार की ओर से कोई मुआवजा, न बीमा का पैसा। वे भगवान भरोसे हैं, और उनकी पीढ़ियों की कमाई इस साल बर्बाद हो गई है।
युवा पीढ़ी अब लीची के बागानों से मोहभंग हो रही है। वे देखते हैं कि उनके पिता और दादा ने कितनी मेहनत की, लेकिन आज उनके पास कुछ नहीं बचा। शहरी क्षेत्रों और उनके आसपास की कीमती जमीन पर लीची के बागान हैं, लेकिन उनसे उचित उपज नहीं मिल पा रही है। प्राकृतिक आपदाएँ, कीड़े, बाजार की अनिश्चितता – सब मिलकर किसान को तोड़ रहे हैं।
आज जरूरत है सरकारी प्रयास और सामूहिक जन भागीदारी की। मुजफ्फरपुर की पहचान शाही लीची को बचाने के लिए सरकार को आगे आना होगा। किसानों को बीमा, अनुदान, तकनीकी सहायता और बाजार तक पहुँच प्रदान करनी होगी। युवाओं को नई पद्धति से लीची के बागान लगाने के लिए प्रेरित करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो शाही लीची की विरासत को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
अंत में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारें होती हैं तो किसानों की रक्षा के लिए। अगर वे लीची किसानों के अस्तित्व को नहीं बचा सकतीं, तो उनका होना व्यर्थ है। आइए, हम सब मिलकर इस अमूल्य धरोहर को बचाने का संकल्प लें, क्योंकि यह केवल एक फल नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और हमारे किसानों की आत्मा है।



