वो दौर था जब बेटियाँ, जिंदा जलाई जातीं थी, जयंती विशेष राजाराम मोहन राय!

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प्रस्तुति – डॉ अनमोल कुमार

22 मई 1772 – भारतीय नवजागरण के जनक

“अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाले राजा”

वो दौर था जब बेटियाँ, जिंदा जलाई जातीं,
सती प्रथा के नाम पर, चिताओं पर चढ़ाई जातीं।
बाल-विवाह का जाल था, विधवा का श्राप भारी,
तब एक सूरज उगा था, नाम था राम मोहन राय।

फारसी-अरबी सीखी, वेद-उपनिषद पढ़े,
बाइबिल-कुरान पढ़कर, सत्य का अर्थ गढ़े।
कहा – “ईश्वर एक है, न पत्थर में न मूरत में,
पाखंड छोड़ो, प्रेम बसाओ, मानवता की सूरत में।”

1828 में “ब्रह्म समाज” की नींव रखी,
एकेश्वरवाद का झंडा, दुनिया के सामने रखा।
अंग्रेजों से लड़कर कानून बनवाया,
1829 में सती प्रथा को दफन करवाया।

नारी शिक्षा के हक में, आवाज बुलंद की,
विधवा विवाह का समर्थन कर, रीत पुरानी बंद की।
अंग्रेजी शिक्षा लाए, अखबार ‘संवाद कौमुदी’,
सोए हुए भारत को, जगाने की जिद थी।

वो राजा नहीं थे, पर सोच के राजा थे,
कुरीति के अंधेरों में, रोशनी के ध्वजा थे।
जात-पात तोड़कर, इंसानियत सिखाई,
आज भी उनकी राह पर, चलता देश भाई।

राजा राम मोहन राय को श्रद्धांजलि

जन्म: 22 मई 1772, राधानगर, बंगाल में हुई।
उपाधि: “आधुनिक भारत के जनक”, “भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत”
मुख्य काम:
सती प्रथा उन्मूलन 1829 – लॉर्ड विलियम बेंटिक से कानून पास कराया
ब्रह्म समाज 1828 – मूर्ति पूजा, जातिवाद, कर्मकांड का विरोध
नारी शिक्षा– लड़कियों के स्कूल का समर्थन प्रेस की आजादी – अखबारों पर सेंसरशिप के खिलाफ लड़ाई

निधन: 27 सितंबर 1833, ब्रिस्टल, इंग्लैंड में हुई। असली लड़ाई तलवार से नहीं, कलम और कानून से जीती जाती है।

आज उनकी जयंती पर प्रण लें कुरीति मिटाएंगे, पढ़ेंगे-पढ़ाएंगे, और हर इंसान को इंसान समझेंगे।

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