रिपोर्ट – अनमोल कुमार
बोधगया। आचार्य कुल पत्रकारिता प्रकोष्ठ एक ऐसे शांत लेकिन तेजस्वी दीपक की तरह है, जिसकी रोशनी ज्ञान, सत्य और संस्कार की त्रिवेणी बनकर चारों दिशाओं में फैलती है। यह प्रकोष्ठ किसी इमारत का नाम नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है—जहाँ पत्रकारिता केवल सीखी नहीं जाती, बल्कि अनुभव की जाती है।
कक्षाओं में प्रवेश करते ही एक अलग वातावरण महसूस होता है।
कहीं शब्दों की खटपट है, कहीं प्रश्नों की चमक, कहीं विचारों की गरमाहट, तो कहीं अनुभवी मार्गदर्शकों की शांत मुस्कुराहट।
जैसे समय खुद ठहरकर सुनता हो कि यहाँ पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि एक साधना है।
दीवारों पर लिखे आदर्श–
“सत्य परम गुरु”
और
“पत्रकार समाज का दर्पण”
हल्की हवा में भी फड़फड़ाते हुए लगते हैं, मानो हर छात्र से संवाद कर रहे हों।
प्रकोष्ठ में बैठे युवा विद्यार्थी अपने हाथों में कलम नहीं, बल्कि समाज की दिशा बदल सकने वाली एक शक्ति थामे रहते हैं। उनके आसपास घूमते आचार्यजन ज्ञान का वह वलय रचते हैं, जहाँ
अनुशासन संस्कृति बन जाता है,
प्रश्न करना परंपरा,
और
नैतिकता पहला पाठ।
मेज़ों पर रखे नोटबुकों के पन्नों पर केवल शब्द नहीं उतरते;
ऊपर उठती हैं संवेदनाएँ,
अंकित होते हैं दृष्टिकोण,
और जन्म लेती है वह चेतना
जो एक पत्रकार को सिर्फ लेखक नहीं—
समाज का प्रहरी बनाती है।
गाँव की गलियों, शहर की आवाज़ों, खेतों की धूल और चौपालों की चर्चाओं तक पहुँचती पत्रकारिता—यही है आचार्य कुल प्रकोष्ठ की असली पहचान।
यहाँ हर छात्र अपने भीतर एक नैतिक पत्रकार को खोजते हुए आगे बढ़ता है,
और हर आचार्य उसमें वह आत्मबल जगाता है
जिसे देखकर लगता है—
“हाँ, पत्रकारिता अभी भी उम्मीदों की दुनिया है।”
आचार्य कुल पत्रकारिता प्रकोष्ठ एक संस्था नहीं,
एक विचार परंपरा है,
एक नैतिक यात्रा है,
एक संस्कारित पत्रकारिता का आश्रम है—
जहाँ युग बदल जाएँ, तकनीक बदल जाए,
लेकिन सत्य की लौ कभी नहीं बुझती। यह आलेख आचार्यकुल पत्रकारिता प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक, कुमुद रंजन सिंह ( अधिवक्ता) और बिहार प्रदेश के मीडिया प्रभारी अनमोल कुमार ने उल्लिखित किया।




