रचना – अनमोल कुमार
हो पथ पर चलना धर्म हमारा,
रुक जाना अपना कर्म न हो।
हो आगे बढ़ना धर्म हमारा,
गिरकर उठने में शर्म न हो।
हो पथ पर चलना धर्म हमारा —-
हो इच्छा शक्ति प्रबल हमारी,
मन से हम कभी दुर्बल न हो।
हो उड़ जाने का साहस हमारा,
गिर पड़े तो कम विश्वास न हो।
हो पथ पर चलना धर्म हमारा —-
वो जीवन पथ भी आदर्श न हो,
जिसपर चलना संघर्ष न हो।
हो छूना अगर उस अनंत व्योम को,
तो फूलों पर सोने में भी हर्ष न हो।
हो पथ पर चलना धर्म हमारा —-
हो एकलव्य सा विश्वास हमारा,
अभिमन्यु सा साहस भी हो।
बस चलते ही जाना हमको,
जबतक चरणों में अपनी ये अनंत आकाश ना हो।
हो पथ चलना धर्म हमारा,
रुक जाना अपना कर्म ना हो।




