खुदीराम बोस की शहादत दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन!

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संतोष तिवारी की रिपोर्ट :-

अमर शहीद खुदीराम बोस की शहादत दिवस के मौके पर मुजफ्फरपुर जेल को पूरी तरह सजाया गया था. जिस स्थान पर बोस को 18 वर्ष की उम्र में फांसी दी गई थी, वहां कई सुगंधित फूलों से सजाया गया और अधिकारियों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की. इस अवसर पर एसडीओ पूर्वी,जेल अधीक्षक बृजेश सिंह मेहता,शहीद खुदीराम बोस के मिदनापुर से आए ग्रामीण समेत जेल के अन्य अधिकारी व कर्मी मौजूद रहे,कोरोना प्रोटोकॉल की वजह से कार्यक्रम बिल्कुल सामान्य रहा

मुजफ्फरपुर जेल में हर वर्ष 11 अगस्त की तड़के सुबह 4 बजकर 2 मिनट से लेकर 5 बजे तक कार्यक्रम आयोजित होता है, जिसमे जेल प्रशासन, जिला प्रशासन के अधिकारियों के अलावे खुदीराम बोस के परिजन भी भाग लेते हैं.

ज्ञात हो कि पश्चिमी बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुबनी निवासी त्रिलोकीनाथ बसु व माता लक्ष्मी प्रिया के सपूत ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देते हुए 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर क्लब के सामने बम विस्फोट किया था। यह विस्फोट दमनकारी जज किंग्सफोर्ड को मौत की घाट उतारने के लिए किया गया था, जो उस रास्ते रोज बग्धी से गुजरा करता था। बम की चपेट में किंग्सफोर्ड नहीं आया।
अंग्रेज वकील की बेटी व पत्नी विस्फोट में मारे गए थे। इस विस्फोट ने अंगेजी हुकूमत की चूलें हिलाकर रख दी थी। मासूम मगर फौलाद जिगर के इस क्रांतिकारी ने स्वतंत्रता आंदोलन की नई इबारत लिख दी। उसी दिन शाम को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर से 35 किमी दूर वैनी पूसा रोड स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर मुकदमा चलाया गया। सरकार की ओर से भानुक व विनोद मजूमदार तथा बोस की ओर से कालिका दास बोस ने मुकदमा लड़ा।
मात्र 8 दिनों तक चली सुनवाई में पक्ष व विपक्ष के बीच जोरदार बहस हुई। अंतत: 13 जुलाई 1908 को फांसी की सजा सुनाई गई। इस फैसले के विरूद्ध कोलकाता उच्च न्यायालय में तत्कालीन न्यायाधीश ब्रास व ऋषि की अदालत में अपील की गई। जज ने फांसी की सजा बहाल रखी। केवल तिथि में फेरबदल कर दिया। फांसी का दिन तय हुआ 11 अगस्त 1908 का दिन।निर्धारित समय पर भारत माता के इस वीर सपूत ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल में खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई। इसके पूर्व उन्हें सेल में रखा गया। सेल के अंदर बोस का मन और प्राण कभी कैद नहीं रहा। वे अपनी क्रांतिकारी भावनाओं को सेल की दीवारों पर कोयले से उकेर देते। इन पंक्तियों को उकेरा था। एक बार विदाई दे मां, घुरे आसी। हांसी-हांसी पोरिबो फांसी, देखबे जोगोतवासी।

वाइट:- विकास हलदर,ग्रामीण, खुदीराम बोस

बाइट:- एसडीओ पूर्वी

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