निलांबुज कुमार झा की रिपोर्ट:-
शुक्रवार की देर शाम चंपानगर के जगन्नाथ मंदिर से बाबा जगन्नाथ का रथ यात्रा निकाली गई। यह रथ यात्रा चंपानगर के बड़ी ठाकुरबाड़ी से निकलकर नरगा, नाथनगर चौक, मनासकामना नाथ चौक, से होते हुए पुनः चंपानगर के बड़ी ठाकुर बाड़ी मंदिर पहुंची। इस रथयात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथपुर आम केला आदि फलों का भोग लगाया। बाबा जगन्नाथ रथ यात्रा के पीछे का पौराणिक मत यह है कि स्नान पूर्णिमा यानी ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन जगत के नाथ श्री जगन्नाथ पुरी का जन्मदिन होता है। उस दिन प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाया जाता है। 108 कलशों से उनका शाही स्नान होता है। फिर मान्यता यह है कि इस स्नान से प्रभु बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आ जाता है। तब 15 दिन तक प्रभु जी को एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जिसे ओसर घर कहते हैं। इस 15 दिनों की अवधि में महाप्रभु को मंदिर के प्रमुख सेवकों और वैद्यों के अलावा कोई और नहीं देख सकता। इस दौरान मंदिर में महाप्रभु के प्रतिनिधि अलारनाथ जी की प्रतिमा स्थपित की जाती हैं तथा उनकी पूजा अर्चना की जाती है।15 दिन बाद भगवान स्वस्थ होकर कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं। इसके बाद द्वितीया के दिन महाप्रभु श्री कृष्ण और बडे भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा जी के साथ बाहर राजमार्ग पर आते हैं और रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। तभी से यह रथ यात्रा देश के विभिन्न मंदिरों से निकाला जाता है।




