बिहार में विकास के 30 साल का हिसाब किताब- सीरीज 2

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शंकर दयाल मिश्रा के साथ पंकज कुमार ठाकुर राजनीति विश्लेषक!

तब सियासी गलियारे में अनिश्चितता बनी कि सरकार पांच साल चल पाएगी। सियासी पंडितों को लालू के दिन लदते नजर आ रहे थे। तब सीधे-सादे दिखने वाले लालू प्रसाद ने फ्रंट फुट पर चौतरफा खेलना शुरू कर दिया। लालू ने एक ओर हल्के-फुल्के ठेठ लहजे में बिहार के गांवों में बसने वाले यादवों को अपनी बातों जातीय शक्ति का अहसास कराया। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी भैंस पर चढ़कर तो कभी जोगीरा गाकर यह यकीन दिलाया कि राजा उन्हीं के बीच में से कोई है। फिर अगड़ों को गरियाकर कर पिछड़ी जातियों के नेता के रूप में खुद को स्थापित किया। उन्होंने बिहार के निर्णायक वोटरों की नब्ज पकड़ ली थी। उनका निपट देहाती अंदाज और अगड़ों पर उनके कड़े बोल उनका वोट बैंक बढ़ाता गया…एक बहुत बड़े वर्ग का नेता बनाता गया…!

चक्र चल चुका है, मंजिल पा के रहेगा। 1990 के बिहार चुनाव के पहले जनता दल का यही नारा था। जनता दल का गठन 1988 में लोकनायक जयप्रकाश के जन्मदिन 11 अक्टूबर को हुआ था। इसकाे चुनाव चिह्न के रूप में चक्र मिला था।

वाकई चक्र चला भी। दशकों तक सत्ता में बनी रही कांग्रेस को जनता ने इस चुनाव में उखाड़ फेका (कैसे? इसका जिक्र इसी वेबवाइट पर शुरू किए गए बिहार के चुनावों का 30 साल का इतिहास और उसका हिसाब-किताब शुरू सीरीज के पहले अंक में कर चुका हूं)। अब लोकनायक जयप्रकाश के चेलों में एक लालू प्रसाद यादव उनकी मूर्ति के समक्ष बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे। यह राष्ट्रीय मोर्चा या जनता परिवार या जनता दल के लिए महज शुरुआत थी, लेकिन यह लालू प्रसाद और बिहार की राजनीति के लिए मील का पत्थर! उस दौर में दुनिया बदल रही थी। राजनीति धीरे-धीरे संघर्षों और बलिदानों की पृष्ठभूमि से निकल रही थी। यह विरासत, धनबल-बाहुबल के दौर में कदम रख चुकी थी। उसी दरम्यान बिहार की बागडोर सीधे-सादे देहाती से दिखने वाले लालू प्रसाद यादव के हाथ में आ गई थी। ठेठ लहजे में मुंहफट, किसी को कुछ भी बकने बाला लालू यादव। वह राजनीति की अंदरूनी पेचीदिगियों से अनभिज्ञ माना जा रहा था। सामने चुनौतियों का एक लंबा जखीरा पड़ा था। पर, लालू न तो राजनीतिक पेचीदिगियों से अनभिज्ञ थे और न ही भविष्य की संभावनाओं से। वे इस बात को बखूबी जानते थे कि राजनीति और वैशाखियों की सरकार में डिलीवरी देना आसान नहीं था। शुरुआत में उन्होंने एक बेहतरीन शासन देने की कोशिश की। लेकिन, नित बदलते राजनीतिक माहौल ने लालू को एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपना बेस्ट देने की जगह जोड़-जुगाड़, देश-बिहार की राजनीति का बेस्ट बना दिया।
तब सियासी गलियारे में अनिश्चितता बनी कि सरकार पांच साल चल पाएगी। सियासी पंडितों को लालू के दिन लदते नजर आ रहे थे। तब सीधे-सादे दिखने वाले लालू प्रसाद ने फ्रंट फुट पर चौतरफा खेलना शुरू कर दिया। लालू ने एक ओर हल्के-फुल्के ठेठ लहजे में बिहार के गांवों में बसने वाले यादवों को अपनी बातों जातीय शक्ति का अहसास कराया। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी भैंस पर चढ़कर तो कभी जोगीरा गाकर यह यकीन दिलाया कि राजा उन्हीं के बीच में से कोई है। फिर अगड़ों को गरियाकर कर पिछड़ी जातियों के नेता के रूप में खुद को स्थापित किया। उन्होंने बिहार के निर्णायक वोटरों की नब्ज पकड़ ली थी। उनका निपट देहाती अंदाज और अगड़ों पर उनके कड़े बोल उनका वोट बैंक बढ़ाता गया…एक बहुत बड़े वर्ग का नेता बनाता गया…!
इसी वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की केंद्र की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने मंडल आयोग कि सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर दी। केंद्र में बाहर से समर्थन करने वाली भाजपा के लिए विश्वनाथ प्रताप की ये घोषणा न उगलते बन रही थी और न निगलते। भाजपा उस समय एक जवान हो रही पार्टी थी। उसका कोई स्पेशल वोट बेंक नही था। वह अगड़े समुदाय के नेताओं द्वारा संचालित थी। उसे देश की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति का पूर्ण ज्ञान था। ऐसे में वह आरक्षण का विरोध करने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी और समर्थन कर अपने उस समय तक जमा हुए सवर्ण वोट बैंक को नाराज भी नहीं कर सकती थी।
देश मंडल की आग में जल रहा था। लाखों छात्र सड़कों पर आ चुके थे। हर दिन कोई-कहीं पुलिस की गोली, आत्महत्या, भीड़ की हिंसा का शिकार बन रहा था। राजनीतिक रहनुमा अपनी रोटियां सेंकने के लिए इसी आग का इस्तेमाल कर रह थे। भाजपा ने अगड़े और पिछड़े के इस संघर्ष से इतर दूसरा ही रास्ता निकाला। लालकृष्ण आडवाणी ने मंडल की आग पर कमंडल का पानी छिड़कने का इंतजाम किया। तब भाजपा ने जाति के आधार पर विभक्त समाज को धर्म के आधार पर जोड़कर बहुसंख्यकों की राजनीति की बीड़ा उठाया। इसके तहत सोमनाथ से अयोध्या के लिए आडवानी का वातानुकूलित राम रथ निकल पड़ा।
रथ यात्रा की शुरुआत होते ही देश में धार्मिक भावनाएं ओतप्रोत होने लगी थी। राम लाला हम आयेंगे, मंदिर वही बनायेंगे… बच्चा-बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का… जैसे गगनभेदी नारे चारों ओर गुंजायमान होने लगा था। ऐसा लग रहा था कि हिन्दुओं का वोट में कुछ हद तक भाजपा की पक्ष में माहौल बना। अब गोलबंद होकर एक जगह जाने वाले मुसलमान मतों का झुकाव किसकी ओर होगा, इसका पता किसी को नहीं था। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और विभिन्न छत्रप अपने-अपने यहाँ मुसलमानों को रिझाने का प्रयास करने में लग गए। पूरे सांप्रदायिक वातावरण में मुलायम और लालू के बीच इस बात की अंदरूनी टक्कर थी कि वीपी सिंह के नजरों में कौन बड़ा चेला है। मुलायम को इस बात का इल्म था कि लालकृष्ण आडवाणी पर सख्ती से केंद्र की सरकार गिर जायेगी, किंतु लालू के मन में इतिहास लिखने की कवायद चल रही थी। 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से शुरू हुई रथ यात्रा 23 अक्टूबर 1990 को बिहार की सीमा में दाखिल हुई तो सभी को चौंकाते हुए लालू प्रसाद ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। लालू के इस कदम का राजनीतिक असर आज भी देखा जाता है।
(आडवाणी की गिरफ्तारी और लालू के मसीहा बनने की कहानी, जारी रहेगी, अगले अंक में…

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