रचना – डॉ अनमोल कुमार
धधक रही है धरती माता,
लपटों में लिपटा आकाश।
पेड़ कटे, नदियाँ सिमटीं,
छीन लिया हमने उसका श्वास।
हरे-भरे जो खेत थे कल तक,
आज वहाँ कंक्रीट के जंगल।
धुआँ उगलती चिमनियाँ हँसतीं,
और साँसों में भर गया जंगल।
सूरज भी अब आग बरसाता,
ओज़ोन की चादर फटी हुई।
ग्लेशियर रोते पिघल-पिघल कर,
समंदर की आँखें चढ़ी हुई।
लीची की डाली सूख चली है,
कोयल का स्वर मौन हुआ।
मुजफ्फरपुर की मिट्टी पूछे –
मेरा श्रृंगार कौन हुआ?
प्लास्टिक के फूल खिले हर ओर,
नदियों में बहता ज़हर-ही-ज़हर।
पक्षी भूले अपना बसेरा,
बच्चे पूछें – बारिश कब घर?
ये AC की ठंडी हवा नहीं है,
ये आने वाली प्रलय का ताप।
जो बोया हमने लालच का बीज,
धरती दे रही उसी का शाप।
जंगल काटे, पहाड़ तोड़े,
हमने विकास इसे नाम दिया।
पर विकास की इस अंधी दौड़ में,
खुद का विनाश सरेआम लिया।
अभी भी वक्त है, रुक जाओ मानव,
धरती माँ की सुन लो पुकार।
एक पेड़ लगाओ, एक बूँद बचाओ,
वरना मिट जाएगा संसार।
नहीं तो आने वाली पीढ़ी,
पूछेगी हमसे एक सवाल –
“जब धरती जल रही थी दादा,
तुमने बुझाया क्यों न ज्वाल?”
आह्वान
आओ मिलकर कसम उठाएं,
हरियाली का दीप जलाएं।
साँसें जो उधार लीं धरती से,
सूखे में न लौटाएं।
क्योंकि धरती माँ है तो हम हैं,
माँ नहीं तो जीवन नहीं।
पर्यावरण बचेगा तो बचेंगे,
वरना बचेगा कुछ भी नहीं।
डॉ अनमोल कुमार
मोकामा, जिला – पटना
( बिहार)



