पत्रकारिता पेशा नहीं, बल्कि एक जुनून , आदत एक बार लग जाए तो फिर छूटती नहीं।

SHARE:

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आलेख – संतोष तिवारी!

कलम वही जो सच लिखे, वरना वो सिर्फ लकड़ी है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उन सबको सलाम जो लिफाफे से नहीं, जमीर से लिखते हैं। दो सौ साल पूरे,
इबादत-ए-कलम जिंदाबाद!

पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जुनून है, एक ऐसी आदत जो एक बार लग जाए तो फिर छूटती नहीं। आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर, आइए समझते हैं उन अजीबोगरीब प्राणियों को, जिन्हें हम पत्रकार कहते हैं, और जो अपनी विचित्रताओं के बावजूद लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।

एक विरोधाभासी इंसान

पत्रकारों की कोई एक जाति नहीं होती, कोई एक विचारधारा नहीं होती, कोई एक चेहरा नहीं होता। हर पत्रकार अलग मिट्टी से बना दिखाई देता है। कोई शहर की चकाचौंध में पला-बढ़ा है तो कोई गाँव की माटी की सोंधी खुशबू लिए हुए है। कोई कट्टर वामपंथी है तो कोई दक्षिणपंथी विचारों का प्रबल समर्थक। कोई धार्मिक रूढ़ियों पर चोट करता है तो कोई आस्था की रक्षा में जुटा रहता है।

लेकिन इन सबके बीच एक चीज समान है – भीतर कहीं एक ऐसी आग जो समान रूप से जलती रहती है। वह आग सत्ता के दरबार से लेकर गली के चौराहे तक हर जगह के ताप को पहचान लेती है। यही आग उन्हें दूसरों से अलग करती है, यही आग उन्हें ‘अजीब’ बनाती है।

दोस्ती का एक अनोखा रिश्ता

पत्रकार यदि दोस्त बन जाए तो फिर दुनिया का सबसे बेफिक्र रिश्ता बन जाता है। ये लोग रात के दो बजे भी फोन उठाकर कह देंगे – “बताओ कहाँ फँसे हो?” और फिर बिना लाभ-हानि गिने आपके साथ खड़े मिलेंगे। उनकी दोस्ती में औपचारिकता कम होती है, अपनापन ज्यादा होता है।

ये चाय के खोखे पर बैठकर भी उतनी ही ईमानदारी से साथ निभाते हैं जितनी बड़े प्रेस क्लब की चमचमाती कुर्सियों पर। पत्रकारों की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि ये अपने लोगों के लिए अक्सर पूरी दुनिया से भिड़ जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पत्रकार यदि मित्र है तो उसके पास खबरों से ज्यादा हौसला होता है।

जब पत्रकार पीछे पड़ जाए

लेकिन साहब, यदि यही पत्रकार किसी बात पर पीछे पड़ जाएँ, तब फिर मामला केवल विरोध का नहीं रहता, वह प्रश्न बन जाता है। और प्रश्न जब लगातार पीछा करने लगें तो बड़े-बड़े सिंहासन काँप उठते हैं। पत्रकार का सबसे खतरनाक हथियार उसका कैमरा या कलम नहीं होता, बल्कि उसकी जिद होती है। वह जिद जो सच को पकड़ लेने तक चैन नहीं लेने देती।

यही कारण है कि सत्ता और पुलिस हमेशा पत्रकारों से दोस्ती भी रखना चाहती है और डरती भी उन्हीं से है। वे जानते हैं कि पत्रकार की कलम किसी भी अत्याचार को उजागर कर सकती है, किसी भी भ्रष्टाचार को बेनकाब कर सकती है।

तीनों लोक में शरण न मिलने वाला तिनका

आपने प्रभु श्रीराम के तिनके की कथा सुनी होगी? जब मर्यादा पुरुषोत्तम ने एक साधारण तिनका छोड़ दिया था तो उसे तीनों लोकों में कहीं शरण नहीं मिली थी। पत्रकारिता भी कुछ वैसी ही है। जब एक पत्रकार किसी विषय पर अड़ जाता है तो फिर कई दरवाज़े बंद होने लगते हैं। लोग फोन उठाना बंद कर देते हैं, बयान बदलने लगते हैं, चेहरे उतरने लगते हैं।

क्योंकि पत्रकारिता केवल शब्द नहीं है, वह स्मृति है। उसे सब याद रहता है – किसने कब क्या कहा था, कौन किस मोड़ पर बदल गया, किसने सच छुपाया और किसने सच बेच दिया। इसीलिए पत्रकार से प्रेम भी सोच-समझकर कीजिए और वैर भी सोच-समझकर।

हार न मानने वाले लोग

ये लोग हार मानना बहुत कम जानते हैं। ये बारिश में भीगते हुए भी कैमरा बचा लेते हैं, भूखे रहकर भी खबर भेज देते हैं, और अपमान पीकर भी अगले दिन फिर सवाल पूछने पहुँच जाते हैं। उनके लिए खबर सिर्फ एक सूचना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है – समाज के प्रति, सत्य के प्रति।

पत्रकारिता दरअसल पेशा कम, एक खतरनाक आदत ज्यादा है। एक बार किसी को यह लग जाए तो फिर वह हर चेहरे के पीछे छिपी कहानी पढ़ने लगता है। हर घटना में कोई कोण तलाशने लगता है, हर बयान में कोई छिपी सच्चाई ढूँढने लगता है।

चाटूकारिता नहीं, पत्रकारिता

लेकिन आज के समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर वह व्यक्ति जो खुद को पत्रकार कहता है, वास्तव में पत्रकार है? क्या वह सच का साथ देता है या सत्ता का? क्या वह जनता की आवाज है या सरकार का मुखपत्र?

सच्ची पत्रकारिता वही है जो सत्ता के सामने झुके नहीं, जो अंधभक्ति न करे, जो चाटूकारिता न हो। पत्रकारिता का मतलब है सवाल पूछना, जवाब माँगना, सच को उजागर करना – चाहे वह कितना भी कड़वा क्यों न हो।

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास संघर्षों से भरा है। राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक, बालकृष्ण भट्ट से लेकर माखनलाल चतुर्वेदी तक, हर युग में हिंदी पत्रकारों ने अपनी कलम से समाज को जगाया है, देश को दिशा दी है।

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर, हम उन सभी पत्रकारों को सलाम करते हैं जो अपनी जान की परवाह किए बिना सच बोलते हैं, जो अंधेरे में उजाला फैलाते हैं, जो तिनके की तरह सच के पीछे पड़े रहते हैं, और जो चाटूकारिता को ठुकराकर सच्ची पत्रकारिता करते हैं।

पत्रकार सचमुच बड़े अजीब होते हैं साहब – अजीब इसलिए कि वे सामान्य मनुष्यों की तरह नहीं जीते, वे अपने सिद्धांतों के लिए जीते हैं, सच के लिए जीते हैं, और हाँ, कभी-कभी तो बस एक अच्छी कहानी के लिए भी जीते हैं।

जय हिंदी पत्रकारिता! हज़ारों-हज़ार सलाम उन बहादुर कलमकारों को जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत बनाए हुए हैं!

Join us on: