अभाव और स्वभाव दोनों में मिलते हैं गोविंद- पं. विश्वकान्ताचार्यजी

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कैमूर/भभुआ(ब्रजेश दुबे):

संसारिक जीवन में जी रहे हरेक लोगों कि आंतरिक स्वेच्छा यही होती है कि हम सर्वविध सुसम्पन्न रहे। हमारे जीवन के आन्तरिक पटल पे, मन की चेतना पे, भाव के अंतःपटल पे भी सर्वानंद बना रहे। लेकिन शास्त्रों कि अपनी अवधारणा है, अपनी विशेषता है, स्वतः कि वैशिष्ट्यता है कि भगवान द्वारकाधीश को अपने भक्तों को अपना के लिए किसी विशेष संसाधन, वस्तु की आवश्यकता नहीं है। वे तो बस भक्त के निर्मला को परख कर देख अंगिकार कर लेते हैं। बडभागी भक्त को स्वधाम में स्थान दे देते हैं। अपने चरणों का दास बनाकर शुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध बना देते है। उक्त बातें भभुआ के पोस्टाफिसगली के वार्ड नंबर सात में हो रहे भव्य संगीतमय श्रीमद्भागवत्कथा के मंच से अन्तर्राष्ट्रीय कथावाचक पूज्य श्री पंडित विश्वकान्ताचार्यजी महाराज( आचार्यद्वय ) वृंदावन, वाराणसी से पधारे महाराज ने कही।
उन्होंने कहा कि अभिमान को तोडना, मद को नष्ट करना, विपत्तियों को समाप्त कर देना भगवान का बस यही भक्तों के प्रति स्वभाव है। यही कारण कि गोविंद अपने कृपापत्रों के अभाव और स्वभाव दोनों में आ जाते हैं। रूक्मिणी को भगवान कि दासी बनाने का अभाव,स्वभाव दोनों था तथापि श्रीहरि उस दासी को अपना प्राणाधार बना लिए। और फिर क्या था अपने प्रियाप्रियतमा को लेकर मेरे प्रभु द्वारिका का विशाल महल में प्रवेश करते हीं बडे विधिविधान से मंगल विवाहोत्सव को मनाए। बडे धुमधाम से रुक्मिणी विवाह के झाँकी को देखकर श्रोतासमाज आनंद मे उमड कर झुमने लगे। आयोजक नर्मदेश्वर चौबे एवं संयोजक शिवकुमार शुक्ल ने बताया कि नगर में हो रहे भव्य कथा का श्रवणलाभ ले कर फुले नहीं समा रहे हैं , आगामी कथाओं के बारे में लोग पुछते समझते देखे जा रहे हैं।

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