रिपोर्ट :- संतोष चौहान,
सुपौल
सुपौल :- सुपौल जिला समेत मिथिलांचल और सीमांचल के इलाके में मखाना की खेती से आर्थिक क्रांति आ चुकी है। मखाना, जिसे फॉक्स नट्स के नाम से भी जाना जाता है, यह एक अत्यधिक पौष्टिक बीज है, जो अपने समृद्ध एंटीऑक्सीडेंट और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए जाना जाता है, जो हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है और वजन प्रबंधन में भी सहायक है।
सदियों से मखाने का उपयोग धार्मिक त्योहारों में उपवास के दौरान किया जाता है। सुखे मेवों या नट्स में मखाना एक ऐसा डिश है, जिसे मिठे और नमकीन दोनों तरह से खाया जा सकता है। मखाना पौष्टिक गुणों से भरपूर होता है, जिसमें पोटेशियम, मैग्नीशियम, आयरन, फास्फोसर, जिंक, फाइबर आदि भरपूर मात्रा में पाई जाती है। मखाना का इस्तेमाल आमतौर पर कई भारतीय अनुष्ठानों और त्योहारों के दौरान पंच मेवा बर्फी और पंचामृत जैसे प्रसाद में भी किया जाता है। इसके अतिरिक्त, खीर, रायता, करी सहित कई भारतीय व्यंजनों में इसका उपयोग होता रहा है। खासकर श्राद्ध कर्म हो या वैवाहिक कार्यक्रम इसमें मखाना का उपयोग अवश्य होता है। इतना ही नहीं जिन पुरुषों को वीर्य संबंधी समस्या होती है, उनके लिए मखाना का सेवन फायदेमंद होता है। इसके सेवन से वीर्य दोष में सुधार होता है।
मखाना में मौजूद एथेनॉल शरीर में फैट सेल्स को कंट्रोल करने में काफी मददगार साबित होता है, जिससे वेट लॉस में मदद मिलता है। मखाने के सेवन से अनिद्रा, तनाव, हार्ट अटैक, मधुमेह, जोड़ों के दर्द, पाचन में गड़बड़ी, झुर्रियां, कब्ज, किडनी आदि रोगों में मखाने का सेवन लाभकारी माना जाता है। 100 ग्राम मखाने में लगभग 10.71 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है। ऐसे में मखाने का सेवन किसी वरदान से कम नहीं है ।

मखाना की खेती झील, तालाब, गढ्ढे एवं स्थिर पानी में होती है। जिसका परिणाम स्वरूप कोशी कमिश्नरी के अलावे मिथिलांचल और सीमांचल में झील – तालाब की संख्या बढ़ती जा रही है और अन्य फसलों की तुलना में मखाना की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। जिससे किसानों को अन्य फसलों की तुलना में अधिक आमदनी हो रही है।
कई क्षेत्रों में मखाना को लावा भी कहा जाता है। ये तालाब, झील, दलदली क्षेत्र के शांत पानी में आसानी से उगाया जाता है। मखाना पोषक तत्वों से भरपूर एक जलीय उत्पाद है। मखाने के बीज को भूनकर लावा तैयार किया जाता है ।
यह अधिकांशतः सुपौल जिले के अलावे दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सीतामढ़ी, पूर्णिया, कटिहार आदि जिलों में भी मखाना की सार्वाधिक खेती की जाती है।
मखाना को 2022 में मिला जीआई टैग
ज्ञात हो कि मखाना को 2022 में जीआई टैग मिला है, जिसे “मिथिला मखाना” के नाम से जाना जाता है। जीआई टैग एक उत्पाद को विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ने और उसकी गुणवत्ता, विशिष्टता और पहचान को सुरक्षित करने का एक तरीका है ।
जीआई टैग एक ऐसा लेबल है जो किसी उत्पाद को विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है।
जीआई टैग के फायदे
जीआई टैग से उत्पाद की पहचान और गुणवत्ता की गारंटी होती है। जीआई टैग से उत्पाद की गुणवत्ता और विशिष्टता को मान्यता मिलती है, जिससे उपभोक्ताओं को विश्वास मिलता है। जीआई टैग से उत्पाद को देश और विदेश में बेहतर पहचान मिलती है, जिससे बाजार में उसकी पहुंच बढ़ती है। जीआई टैग से उत्पादकों को बेहतर कीमत मिलती है और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
क्या है कानूनी सुरक्षा
जीआई टैग से उत्पाद को कानूनी सुरक्षा मिलती है, जिससे कोई अन्य व्यक्ति या कंपनी उस नाम से समान उत्पाद नहीं बेच सकता है।
जीआई टैग से संबंधित उद्योग और व्यवसाय को बढ़ावा मिलता है, जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।
दस वर्षो के लिए मिलता है जीआई टैग
जीआई टैग प्राप्त करने के लिए, उत्पाद की गुणवत्ता, विशिष्टता और भौगोलिक क्षेत्र से संबंध का प्रमाण देना होता है। जीआई टैग दस वर्ष के लिए वैध होता है, जिसे बाद में नवीनीकृत किया जा सकता है।
भारत में, जीआई टैग वस्तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत दिए जाते हैं। मिथिलांचल के मखाना को जीआई टैग मिलने से अब इस मखाना को “मिथिला मखाना” के नाम से जाना जाता है, जो इसके उत्पादकों और किसानों के लिए एक बड़ा लाभ है।



