“बाढ़ ने छीना घर और अब रिश्ते: भागलपुर का मसाढूं गांव बना ‘कुंवारों की बस्ती’!

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रिपोर्ट- निभाष मोदी

बिहार के भागलपुर जिले के सबौर प्रखंड स्थित मसाढूं गांव से एक दिल को झकझोर देने वाली सामाजिक सच्चाई सामने आई है। यह गांव आजकल ‘कुंवारों की बस्ती’ के नाम से जाना जाने लगा है। वजह है—गंगा नदी का कटाव और पिछली साल की विनाशकारी बाढ़ जिसने इस गांव की तस्वीर ही बदल दी।

मसाढूं गांव के ग्रामीण विशुनदेव मंडल बताते हैं कि बाढ़ में न सिर्फ घर-बार उजड़ गए, बल्कि बेटे-बेटियों के रिश्ते भी टूटने लगे हैं। जो शादियाँ तय थीं, वे रुक गईं और नए रिश्ते आना भी बंद हो गए। कारण साफ है—गांव गंगा नदी के कटाव वाले मुहाने पर बसा है। कोई भी पिता अपनी बेटी की शादी ऐसे असुरक्षित और उजड़े इलाके में नहीं करना चाहता।

विशुनदेव मंडल की मानें तो, “जब हमारे पास खुद रहने का ठिकाना नहीं बचा है, तो समधी कहां से आएंगे? पिछले साल की तबाही ने सबकुछ छीन लिया, अब बेटी-बेटे की शादी के लिए कोई तैयार नहीं होता।”

गांव की बेटियों की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। दहेज में देने लायक न तो ज़मीन बची है, न कोई जमापूंजी। इस कारण शादी के प्रस्ताव भी ठुकरा दिए जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, अब हालात ऐसे हैं कि कई युवा लड़के-लड़कियाँ शादी की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन कोई रिश्ता नहीं बन रहा।

इस गंभीर सामाजिक मुद्दे पर ममलखा पंचायत के मुखिया अभिषेक मंडल भी चिंतित दिखे। उन्होंने गंगा किनारे बातचीत के दौरान कहा, “यह सिर्फ आर्थिक या भौगोलिक समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है। गांव के लोगों को पुनर्वास की सख्त जरूरत है।”

उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे गांवों के लिए विशेष पुनर्वास और सहायता योजना चलाई जाए ताकि इन परिवारों को फिर से सामाजिक सम्मान और स्थायित्व मिल सके।

गंगा किनारे बसे मसाढूं जैसे सैकड़ों गांवों में यही हालात हैं, जहां प्रकृति की मार ने लोगों का जीवन पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन जब यह मार सामाजिक रिश्तों और इंसानी गरिमा को भी लीलने लगे, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं रह जाती, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी बन जाती है।

बाइट्स:

विशुनदेव मंडल, ग्रामीण, मसाढूं, सबौर, भागलपुर, बिहार

अभिषेक मंडल, मुखिया, ममलखा पंचायत, सबौर, भागलपुर, बिहार

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